
मुंबई. सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड के बाद फिल्म इंडस्ट्री में नेपोटिज्म और संगीत माफिया को लेकर चर्चा जोरों पर है। ऐसे में सिंगर सोना मोहापात्रा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया। इस वीडियो के जरिए सोना ने लोगों को इंडस्ट्री में किए जाने वाले जरूरी बदलाव पर बात की है, जिसे एक लाख से भी ज्यादा बार देखा जा चुका है। सोना का मानना है कि पूरे म्यूजिकल इको-सिस्टम को फिर से जमीन पर उतारने की जरूरत है।
यहां टैलेंट का गला घोटा जाता है: सोना मोहापात्रा
सोना मोहापात्रा ने कहा कि भारतीय संगीत उद्योग फिल्म इंडस्ट्री का मात्र एक एक्सटेंशन है और इसलिए फिल्म संगीत पर बहुत जोर देता है। सिंगर कहती है कि लेकिन, हकीकत में हमारे यहां पर उभरती हुई प्रतिभाओं का गला घोंट दिया जाता है। उनका मानना है कि मनोरंजन उद्योग में लगभग हर कोई, चाहे वह कितना भी अमीर या सफल क्यों न हो, उसे 'संघर्षशील' मानसिकता वाला लगता है। 100 गानों में से फीमेल की आवाज में 8 से अधिक गाने नहीं है। यह, उस इंडस्ट्री से जिसने लता मंगेशकर और आशा भोंसले जैसे टाइटन्स को जन्म दिया। महिलाओं को एक रोमांटिक गाने में महज 4 लाइने दी जाती हैं।
सोना मोहापात्रा आगे कहती हैं कि इस सच से सभी को परेशान होना चाहिए और गंभीरता के साथ सोचना चाहिए कि हमारे देश भारत में एक वास्तविक संगीत उद्योग नहीं है। म्यूजिक इंडस्ट्री पूरी तरह से बॉलीवुड पर निर्भर है। हमारे देश में जरुरत से ज्यादा टैलेंट है, म्यूजिक है और उससे कहीं ज्यादा म्यूजिक के लिए प्रेम। आजादी के इतने सालों के बाद भी एक स्वतंत्र संगीत उद्योग का निर्माण नहीं हो सका है। संगीत इस देश में चुनाव प्रचार, टूथपेस्ट, खेल की घटनाओं और बड़ी बजट की फिल्मों सहित लगभग सब कुछ बेचता है, लेकिन दुख की बात है कि मीडिया में सबसे कम आंका जाने वाला वस्तु है।
सिंगर्स को बॉलीवुड में मिला दूसरा दर्जा
सोना मोहापात्रा कहती हैं कि मेनस्ट्रीम के सिंगर बॉलीवुड में दूसरे दर्जे के नागरिक कहलाए जाते हैं और एक साउंड ट्रैक बनाते समय उनके साथ रैगिंग और उन्हें अपमानित किया जाता है। एक गाने के राइटर को गायक चुनने का भी अधिकार नहीं है और वो खुद रचनात्मकता की प्रक्रिया के प्रति अपमानजनक है। यही कारण है कि इतने सारे सिंगर्स द्वारा एक ही गाने को डब किया जाता है। उनका विश्वास है कि इस प्रक्रिया से अंत में सॉन्ग खत्म हो जाएंगे।
सोना कहती हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में म्यूजिक स्तर की मोनोपॉली और एकतरफा शक्तिशाली सत्ता के बारे में चर्चा करना जरूरी है, लेकिन ये सभी के लिए सेल्फ रिफ्लेक्ट करने का समय भी समान है। ये जरूरी है कि दर्शक भी मनोरंजन में विश्व स्तर के स्टैंडर्ड के लिए ऐसी मान्यता और आकांक्षा को खारिज करना शुरू कर दें। जो हमारे एंटरटेनर से प्रमाणिकता और अखंडता की अधिक मांग से आती है।
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