
नई दिल्ली: भारतीय दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) के नियमनों में संशोधनों से कानून में खामियों को दुरुस्त कर परिसमापन के तहत कंपनियों के पूर्व प्रवर्तकों के पिछले दरवाजे से प्रवेश को रोकने में मदद मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ये संशोधन दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के उद्देश्यों के अनुकूल हैं।
आईबीबीआई ने भारतीय दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता बोर्ड (कॉरपोरेट व्यक्तियों के लिए दिवाला निपटान प्रक्रिया), नियमन, 2016 तथा भारतीय दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता बोर्ड (परिसमापन प्रक्रिया) नियमनों-2016 में संशोधन किया है। परिसमापन प्रक्रिया नियमनों में संशोधन के तहत जो व्यक्ति पात्र नहीं हैं, अब वे परिसमापन के किसी भी चरण में किसी समझौते की व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन पाएंगे।
इसके अलावा कोई ऋणदाता यदि स्वतंत्र रूप से गारंटी वाली संपत्तियों को बेचने का फैसला करता है, तो आईबीसी के तहत वह ऐसे व्यक्ति को इसकी बिक्री नहीं कर पाएगा, जो पात्र नहीं है। लक्ष्मीकुमारन एंड श्रीधरन अटार्नीज के एक्सक्यूटिव पार्टनर पुनीत दत्त त्यागी ने कहा, ‘‘इससे विशेष रूप से राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) द्वारा पारित कुछ फैसलों को बदला जा सकेगा।’’
टैक्समैन के उप महाप्रबंधक रचित शर्मा ने कहा कि आईबीसी नियमनों में नए संशोधन सिक्योर्ड ऋणदाता परिसमापन वाली कंपनी की संपत्तियों को ऐसे व्यक्ति को बेचने या स्थानांतरित करने से रोकते हैं, जो दिवाला समाधान योजना पेश करने के पात्र नहीं हैं।
(यह खबर समाचार एजेंसी भाषा की है, एशियानेट हिंदी टीम ने सिर्फ हेडलाइन में बदलाव किया है।)
(फाइल फोटो)
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