
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर एक बड़े वित्तीय विवाद में घिर गए हैं। इस बार मामला उनके और उनके सलाहकारों द्वारा किए गए बड़े पैमाने पर स्टॉक सौदों से जुड़ा है। इस साल के पहले तीन महीनों में ही उन्होंने 3,700 से ज़्यादा शेयर सौदे किए हैं। विवाद इसलिए बढ़ा है क्योंकि इनमें से ज़्यादातर सौदे उन बड़ी कंपनियों के शेयरों में हुए हैं, जिन पर अमेरिकी सरकार की नीतियों और फैसलों का सीधा असर पड़ता है। ये चौंकाने वाले आंकड़े ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में सामने आए हैं। अमेरिका की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी, फाइनेंस और एविएशन कंपनियों के करोड़ों रुपये के शेयर इस छोटी सी अवधि में खरीदे और बेचे गए।
आसान भाषा में समझें तो, जनवरी से मार्च के बीच ट्रंप ने हर दिन औसतन 40 से ज़्यादा स्टॉक सौदे किए! यह उछाल इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि पिछले साल के आखिरी तीन महीनों में सिर्फ 380 सौदे हुए थे। शेयर बाज़ार के बड़े-बड़े दिग्गज भी इस रफ़्तार को देखकर हैरान हैं।
बाज़ार के जानकारों का कहना है कि किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का इतने कम समय में इतनी ज़्यादा स्टॉक ट्रेडिंग करना पहले कभी नहीं सुना गया। 'द वेल्थ अलायंस' के मैनेजिंग डायरेक्टर एरिक डिटन ने कहा कि अपने 40 साल के अनुभव में उन्होंने ऐसा कुछ नहीं देखा है। इन बड़ी कंपनियों में करोड़ों का निवेश Nvidia, Microsoft, Amazon और Boeing जैसी दिग्गज कंपनियों के शेयरों में किया गया।
बड़े निवेश: Nvidia, Oracle, Microsoft, Boeing और Costco जैसी कंपनियों में से हर एक में ट्रंप ने कम से कम 10 लाख डॉलर के शेयर खरीदे हैं।
बड़ी बिकवाली: अकेले 10 फरवरी को, ट्रंप ने Microsoft, Meta और Amazon के शेयर बेचकर 50 लाख से 2.5 करोड़ डॉलर के बीच कमाई की।
अन्य कंपनियां: इस लिस्ट में Uber, eBay, Abbott Laboratories, AT&T, और Dollar Tree के साथ-साथ मनोरंजन जगत की बड़ी कंपनियां जैसे Netflix, Warner Bros., और Paramount Global भी शामिल हैं।
इनमें से कई कंपनियां अपने कारोबार के लिए सीधे तौर पर अमेरिकी सरकार की नीतियों और अंतरराष्ट्रीय फैसलों पर निर्भर हैं।
Nvidia: इस कंपनी को चीन में एडवांस AI चिप्स एक्सपोर्ट करने के लिए अमेरिकी सरकार की खास इजाज़त चाहिए होती है।
Boeing: यह कंपनी अमेरिकी सरकार के रक्षा और अंतरिक्ष सौदों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है।
टेक कंपनियां: Microsoft, Amazon, और Meta जैसी कंपनियां अक्सर सरकार की एंटी-ट्रस्ट जांच और AI नियमों के दायरे में रहती हैं।
जब किसी देश का राष्ट्रपति ऐसे पद पर रहते हुए इन कंपनियों के शेयरों में ट्रेडिंग करता है, तो यह गैर-कानूनी न होते हुए भी नैतिकता से जुड़े बड़े सवाल खड़े करता है। पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश और बिल क्लिंटन ने अपने कार्यकाल के दौरान अपने कारोबार को स्वतंत्र 'ब्लाइंड ट्रस्ट' को सौंप दिया था। लेकिन ट्रंप ने न तो अपना कारोबार पूरी तरह से छोड़ा और न ही किसी स्वतंत्र ट्रस्ट को दिया। फिलहाल, ट्रंप के बच्चे ही ट्रंप ऑर्गनाइजेशन का एक बड़ा हिस्सा कंट्रोल करते हैं।
कुछ महीने पहले बाज़ार में हुई एक और घटना भी इस मामले से जुड़कर देखी जा रही है। जब ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ईरान के साथ बातचीत में प्रगति होने का बयान दिया, तो उससे ठीक पहले कुछ ट्रेडर्स ने बाज़ार में इस बात पर बड़ा दांव लगाया था कि तेल की कीमतें गिरेंगी और अमेरिकी शेयर बाज़ार चढ़ेगा। जैसे ही ट्रंप का बयान आया, ठीक वैसा ही हुआ। हालांकि, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इसमें सीधे तौर पर ट्रंप का हाथ था, लेकिन बाज़ार में यह शक़ गहरा गया है कि कहीं आधिकारिक जानकारी लीक तो नहीं हुई थी।
ट्रंप के दामाद और मिडिल ईस्ट के लिए विशेष दूत रहे जेरेड कुशनर के वित्तीय सौदे भी इस विवाद को और हवा दे रहे हैं। कुशनर की इन्वेस्टमेंट कंपनी 'एफिनिटी पार्टनर्स' सऊदी अरब समेत कई खाड़ी देशों के करोड़ों डॉलर के फंड को मैनेज करती है। आलोचकों का कहना है कि एक तरफ खाड़ी देशों के साथ राजनयिक बातचीत करना और दूसरी तरफ़ उन्हीं से जुड़ा निजी कारोबार चलाना एक गलत परंपरा है। हालांकि कुशनर के खिलाफ भी कुछ गलत करने का कोई सबूत नहीं है, लेकिन वित्तीय जानकारों का मानना है कि इन पदों के बीच के संबंधों की बारीकी से जांच होनी चाहिए।
हालांकि, व्हाइट हाउस ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। व्हाइट हाउस के एक प्रवक्ता ने कहा कि ट्रंप सिर्फ अमेरिकी लोगों की भलाई के लिए काम करते हैं और इसमें हितों का कोई टकराव नहीं है। ट्रंप ऑर्गनाइजेशन ने भी कहा है कि ट्रंप के निवेश को बाहर की स्वतंत्र वित्तीय संस्थाएं मैनेज करती हैं और इसमें ट्रंप या उनके परिवार का कोई सीधा दखल नहीं है। उनके मुताबिक, सरकार के पास कुछ शेयर जानकारी जमा करने में हुई देरी के लिए सिर्फ छोटा-मोटा जुर्माना (प्रति फाइलिंग 200 डॉलर) लगा है। खैर, जो भी हो, वॉशिंगटन में इस बात पर राजनीतिक घमासान छिड़ गया है कि क्या किसी राष्ट्रपति का पद पर रहते हुए इस तरह के स्टॉक सौदे करना सही है।
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