
Ethanol Production Water Consumption: क्या आप जानते हैं कि आपकी कार को 'क्लीन एनर्जी' से चलाने की कीमत भारत के कई शहर चुका रहे हैं? जिसे हम 'ग्रीन फ्यूल' (Green Fuel) कहकर प्रमोट कर रहे हैं, वह असल में जलस्तर (Groundwater) को पाताल में धकेल रहा है। हालिया रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की चेतावनी ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है। चावल से बना 1 लीटर एथेनॉल तैयार करने में लगभग 10,790 लीटर पानी की खपत हो रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है, क्या एथेनॉल ब्लेंडिंग देश को एक बड़े जल संकट की ओर ले जा रहा है? आइए समझते हैं...
भारत सरकार कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने (Ethanol Blending) का कार्यक्रम आगे बढ़ा रही है। हालांकि इसका मकसद विदेशी मुद्रा बचाना और कार्बन उत्सर्जन कम करना है, लेकिन इसके पीछे की कीमत पानी से चुकाई जा रही है। एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली प्रमुख फसलें जैसे चावल, गन्ना और मक्का भारत की सबसे ज्यादा पानी पीने वाली फसलें हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह भारत के जलसंकट को और अधिक गहरा कर सकता है, क्योंकि इन कच्चे मालों को उगाने और प्रॉसेस करने की प्रक्रिया पूरी तरह से पानी पर आधारित है।
एथेनॉल उत्पादन में पानी की खपत के आंकड़े किसी को भी डराने के लिए काफी हैं। 2024 में फूड सेक्रेटरी संजीव चोपड़ा की ओर से शेयर किए गए आंकड़ों के अनुसार, चावल से मात्र एक लीटर एथेनॉल तैयार करने में लगभग 10,790 लीटर पानी खर्च हो जाता है, जिसमें सिंचाई और प्रोसेसिंग दोनों शामिल हैं। अगर हम मक्के की बात करें तो इसके लिए प्रति लीटर 4,670 लीटर पानी चाहिए, जबकि गन्ने के लिए यह आंकड़ा 3,630 लीटर है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 1 किलो चावल उगाने में करीब 3,000 लीटर पानी लगता है, लेकिन एक टन चावल से सिर्फ 470 लीटर एथेनॉल ही मिलता है। यह अनुपात भारत जैसे देश के लिए खतरनाक हो सकता है, जहां पीने के पानी की पहले से किल्लत है।
नीति आयोग (NITI Aayog) की 'कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स' (CWMI) रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे 21 प्रमुख शहरों का भूजल स्तर शून्य (Zero) पर पहुंच सकता है। हैरानी की बात यह है कि एथेनॉल के अधिकतर प्लांट उन्हीं राज्यों में हैं जो पहले से ही जल संकट (Water Stress) से जूझ रहे हैं। महाराष्ट्र के प्लांट की क्षमता 396 करोड़ लीटर है, जबकि विदर्भ और मराठवाड़ा में किसान पीने के पानी को तरस रहे हैं। उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में भी भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञ (IEEFA) स्वाति शेषाद्रि बताती हैं कि इन प्लांटों से निकलने वाला दूषित अपशिष्ट जल (Vinasse) जमीन और नदियों को प्रदूषित कर रहा है, जो 'ग्रीन एनर्जी' के दावे पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।
सरकार ने साल 2025-26 के लिए 90 लाख टन चावल एथेनॉल के लिए आवंटित करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत गरीबों को दिए जाने वाले टूटे चावल (Broken Rice) की हिस्सेदारी 25% से घटाकर 10% की जा रही है। इससे भी कई सवाल उठ रहे हैं।
एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि एथेनॉल मिलें भारी मात्रा में अपशिष्ट जल (Vinasse) पैदा करती हैं। अगर इसका सही समाधान न निकाला जाए, तो यह सतह के पानी और भूजल दोनों को जहरीला बना सकता है। जिसे हम 'ग्रीन एनर्जी' कह रहे हैं, वह जल प्रदूषण का नया स्रोत बन सकती है।
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