बिक्री बढ़ी, फिर भी डूब गया मुनाफा... सरकारी तेल कंपनियों को कैसे हुआ भारी नुकसान?

Published : Jul 22, 2026, 11:31 PM IST
HPCL and BPCL Report Massive Q1 Losses as Rising Crude Oil Prices Hit Margins

सार

HPCL और BPCL को वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में हजारों करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। जानिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, पेट्रोल-डीजल की कीमतें न बढ़ाने और रिफाइनरी कारोबार के बावजूद दोनों सरकारी तेल कंपनियों को नुकसान क्यों हुआ।

देश की सरकारी तेल कंपनियों हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) और भारत पेट्रोलियम (BPCL) को वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारी वित्तीय झटका लगा है। दोनों कंपनियां हजारों करोड़ रुपये के शुद्ध घाटे में पहुंच गईं। इसकी प्रमुख वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और लंबे समय तक पेट्रोल, डीजल व एलपीजी को लागत से कम कीमत पर बेचना रही। हालांकि रिफाइनिंग कारोबार से आय बेहतर रही, लेकिन ईंधन बिक्री में हुए नुकसान ने पूरे मुनाफे को खत्म कर दिया।

HPCL और BPCL के नतीजों में बड़ा उलटफेर

एचपीसीएल ने अप्रैल-जून तिमाही में 12,265 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा दर्ज किया। पिछले वर्ष इसी अवधि में कंपनी को 4,111 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था। वहीं, मुख्य परिचालन कारोबार के आधार पर भी कंपनी को 11,526 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में लाभ दर्ज किया गया था।

दूसरी ओर, बीपीसीएल को भी पहली तिमाही में 3,962 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ। यह कंपनी के लिए लगातार 15 तिमाहियों के बाद पहला घाटा है। पिछले साल अप्रैल-जून तिमाही में कंपनी ने 6,124 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था। दिलचस्प बात यह है कि दोनों कंपनियों की कुल आय में वृद्धि दर्ज की गई। एचपीसीएल की आय बढ़कर 1.45 लाख करोड़ रुपये और बीपीसीएल की आय 1.59 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यानी बिक्री बढ़ी, लेकिन लागत उससे कहीं अधिक तेजी से बढ़ने के कारण लाभ नहीं बच सका।

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कच्चे तेल की महंगाई बनी घाटे की सबसे बड़ी वजह

विशेषज्ञों के अनुसार, वेस्ट एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक उछाल आया। सामान्य तौर पर कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर पेट्रोल और डीजल के दाम भी बढ़ाए जाते हैं, लेकिन सरकारी तेल कंपनियों ने करीब ढाई महीने तक ईंधन की खुदरा कीमतों में बदलाव नहीं किया। इससे कंपनियों को लागत से कम कीमत पर ईंधन बेचना पड़ा, जिसका सीधा असर उनकी कमाई पर पड़ा।

आगे क्या रहेगा असर?

बाद में मई के दूसरे हिस्से में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7.50 रुपये प्रति लीटर से अधिक की बढ़ोतरी की गई और घरेलू एलपीजी सिलेंडर भी महंगा हुआ। हालांकि तब तक कंपनियां बड़ा वित्तीय नुकसान झेल चुकी थीं।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहती हैं और घरेलू ईंधन मूल्य निर्धारण सामान्य बना रहता है, तो आने वाली तिमाहियों में सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति में सुधार देखने को मिल सकता है। फिलहाल पहली तिमाही के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि बढ़ती बिक्री हमेशा मुनाफे की गारंटी नहीं होती, खासकर तब जब लागत और बाजार परिस्थितियां तेजी से बदल रही हों।

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