
शेयर बाजार में नियमों की अनदेखी के आरोपों का सामना कर रहे अडानी ग्रुप को बड़ी राहत मिली है। सेबी (SEBI) ने साफ कर दिया है कि दो विदेशी पोर्टफोलियो फंड के जरिए अडानी ग्रुप की चार कंपनियों में हुए निवेश में गौतम अडानी के भाई विनोद अडानी का हाथ साबित नहीं हो पाया है। इसके साथ ही सेबी ने मिनिमम पब्लिक शेयरहोल्डिंग नियमों के उल्लंघन की जांच को बंद कर दिया है।
सेबी ने बताया कि इमर्जिंग इंडिया फोकस फंड और ईएम रिसर्जेंट फंड, इन दो विदेशी फंड्स के निवेश फैसलों में विनोद अडानी के दखल का कोई सबूत नहीं मिला है। इन फंड्स ने अडानी एंटरप्राइजेज, अडानी पावर, अडानी पोर्ट्स एंड एसईजेड और अडानी ट्रांसमिशन (अब अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस) में पैसा लगाया था।
इस मामले की जांच जून और जुलाई 2020 में मिली शिकायतों के बाद शुरू हुई थी। मुख्य आरोप यह था कि 2013 से 2018 के बीच इन दोनों विदेशी फंड्स के पास जो शेयर थे, वे असल में कंपनी के प्रमोटर्स के थे, लेकिन उन्हें आम निवेशकों का बताकर गलत तरीके से पेश किया गया। इसी आधार पर सेबी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
लेकिन जांच में यह साबित नहीं हो सका कि इन दोनों विदेशी फंड्स के निवेश के फैसले विनोद अडानी ले रहे थे। सेबी ने साफ कहा कि सिर्फ आर्थिक या कारोबारी रिश्तों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि किसी व्यक्ति का कंपनी पर कंट्रोल है। इसके लिए फंड के मैनेजमेंट या पॉलिसी फैसलों में सीधा दखल साबित होना जरूरी है।
सेबी ने उन आरोपों को भी खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि विनोद अडानी ने नासिर अली शाबान अहली और चांग चुंग-लिंग के जरिए कंट्रोल बना रखा था। यह दावा भी गलत साबित हुआ कि इन दोनों ने विदेशी फंड्स के जरिए अडानी की कंपनियों में पैसा लगाने वाले चार निवेशकों को आर्थिक मदद दी थी। इस बात का भी कोई सबूत नहीं मिला कि विनोद अडानी ने इसके लिए पैसा दिया था।
हालांकि, जांच के दौरान सही और पूरी जानकारी न देने पर सेबी ने नासिर अली शाबान अहली और चांग चुंग-लिंग पर 20-20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। नोटिस में शामिल 18 अन्य संस्थाओं ने पहले ही जुर्माना भरकर केस खत्म करवा लिया था। इसके अलावा, अडानी पावर में ओपल इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के निवेश से जुड़े आरोप को भी सेबी ने खारिज कर दिया है।
कारण बताओ नोटिस में सबसे बड़ा आरोप यह था कि इस निवेश के जरिए 1,984 करोड़ रुपये का अवैध फायदा उठाया गया। लेकिन जब फंड्स पर विनोद अडानी या ओपल का कंट्रोल ही साबित नहीं हो पाया, तो नियमों के उल्लंघन का दावा भी नहीं टिक सका। इसके साथ ही इस मामले से जुड़ी बाकी सभी कार्यवाही भी खत्म हो गई हैं।
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