एन चंद्रशेखरन फिर Tata Sons के चेयरमैन बने, लेकिन Noel Tata ने विरोध किया। Tata Trusts के वोट और Casting Vote को लेकर क्यों उठे कानूनी सवाल।
Noel Tata vs N Chandrasekharan: एन चंद्रशेखरन को टाटा संस के चेयरमैन के तौर पर अगले 5 साल के कार्यकाल के लिए दोबारा नियुक्त कर दिया गया है। हालांकि, उनके रिअपॉइंटमेंट को लेकर टाटा संस के बोर्ड में मतभेद सामने आया है। खास बात यह है कि टाटा ट्रस्ट्स के दो नॉमिनी डायरेक्टरों ने इस प्रस्ताव पर अलग-अलग वोट किया। इस घटनाक्रम ने यह कानूनी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल बोर्ड में बहुमत और कास्टिंग वोट के आधार पर चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को पूरी तरह मंजूरी मिली मानी जा सकती है या टाटा ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टरों से अलग से जरूरी समर्थन भी हासिल करना था।
चंद्रशेखरन दोबारा कैसे बने TATA Sons के चेयरमैन?
टाटा संस की इक्विटी में टाटा ट्रस्ट्स और उससे जुड़े ट्रस्ट्स की करीब 66% हिस्सेदारी है। कंपनी के बोर्ड में ट्रस्ट्स के दो नॉमिनी डायरेक्टर हैं—टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन।
गुरुवार को हुई बोर्ड मीटिंग में एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव पर वोटिंग हुई। इस दौरान नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया, जबकि टाटा ट्रस्ट्स के दूसरे नॉमिनी डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के पक्ष में वोट किया।
दोनों नॉमिनी डायरेक्टरों के अलग-अलग रुख के कारण बोर्ड में वोट बराबर हो गए। इसके बाद बैठक की अध्यक्षता कर रहे इंडिपेंडेंट डायरेक्टर हरीश मनवानी ने अपना कास्टिंग वोट चंद्रशेखरन के पक्ष में दिया।
इसके बाद प्रस्ताव पास हो गया और एन चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए टाटा संस का चेयरमैन फिर से नियुक्त कर दिया गया।
क्यों खड़ा हुआ कानूनी सवाल?
लेकिन इसी के बाद यह कानूनी सवाल सामने आया कि कास्टिंग वोट की भूमिका सिर्फ बोर्ड में बराबरी की स्थिति खत्म करने तक सीमित थी या इससे ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टरों से जुड़ी किसी अलग आवश्यकता को भी पूरा माना जा सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, डीवाई चंद्रचूड़ की कानूनी राय में दोनों चीजों को अलग-अलग माना गया है। इसमें माना जाता है कि ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टरों का जरूरी समर्थन एक स्वतंत्र जरूरत है, जबकि कास्टिंग वोट का उद्देश्य सामान्य तौर पर बोर्ड में बराबरी की स्थिति को खत्म करना होता है।
Noel Tata ने Chandrasekharan के बारे में क्या कहा?
टाटा संस बोर्ड को दिए गए नोएल टाटा के विस्तृत बयान में सीधे तौर पर यह कानूनी तर्क नहीं दिया गया है कि एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति अमान्य है।
उनका बयान मुख्य रूप से टाटा संस की प्रक्रिया और कंपनी को अनलिस्टेड रखने के मुद्दे पर केंद्रित है।
हालांकि, उनके बयान से चंद्रशेखरन और टाटा संस के भविष्य के स्ट्रक्चर को लेकर उनके रुख की जानकारी मिलती है।
नोएल टाटा के मुताबिक, फरवरी 2026 में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर हुई बोर्ड चर्चा के दौरान उन्होंने चंद्रशेखरन से पूछा था कि क्या वह टाटा संस को प्राइवेट यानी अनलिस्टेड बनाए रखने के अपने व्यक्तिगत संकल्प और इच्छा को स्पष्ट कर सकते हैं।
उन्होंने यह भी पूछा था कि इस उद्देश्य को सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए गए हैं या नहीं।
नोएल के बयान के मुताबिक, चंद्रशेखरन ने दोबारा कहा था कि सभी जरूरी कदम उठाए जा चुके हैं।
नोएल ने कहा कि उन्होंने चंद्रशेखरन के इस भरोसे को स्वीकार किया, लेकिन वह कंपनी के पास मौजूद विकल्पों, रेगुलेटर के साथ हुई बातचीत और भविष्य में उठाए जा सकने वाले कदमों की पूरी जानकारी चाहते थे।
उनका यह भी कहना था कि टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स को मिलकर अपनी आगे की स्थिति तय करनी चाहिए।
Tata Sons की Listing क्यों बना बड़ा विवाद?
एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का विवाद टाटा संस के भविष्य के मालिकाना और रेगुलेटरी स्ट्रक्चर को लेकर चल रही बड़ी बहस के बीच सामने आया है।
मार्च 2024 में टाटा संस के बोर्ड ने सर्वसम्मति से फैसला किया था कि कंपनी को अनलिस्टेड ही रहना चाहिए।
इसी फैसले के तहत टाटा संस ने RBI में अपना NBFC रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट स्वेच्छा से सरेंडर करने के लिए आवेदन किया था।
नोएल टाटा के बयान के अनुसार, इसके बाद इस प्रस्ताव को दोबारा बोर्ड के सामने विचार के लिए नहीं रखा गया। उनके मुताबिक, किसी भी डायरेक्टर ने इस फैसले पर दोबारा विचार करने का प्रस्ताव नहीं दिया।
यानी कंपनी को अनलिस्टेड रखने का फैसला पहले ही बोर्ड स्तर पर लिया जा चुका था।
Listed Company बनने पर क्या बदल सकता है?
नोएल टाटा के अनुसार, अगर टाटा संस लिस्टेड हो जाती है तो कंपनी के शेयरहोल्डर्स का दायरा बढ़ जाएगा।
टाटा ट्रस्ट्स के अलावा इंस्टीट्यूशनल निवेशक, विदेशी निवेशक और दूसरे पब्लिक शेयरहोल्डर्स भी कंपनी में हिस्सेदार होंगे।
नोएल टाटा यह नहीं कहते कि इन शेयरहोल्डर्स के हित गलत होंगे। उनका कहना है कि उनके हित और प्राथमिकताएं टाटा ट्रस्ट्स से अलग हो सकती हैं।
उनके मुताबिक, लिस्टेड होल्डिंग कंपनी को अपने पब्लिक शेयरहोल्डर्स के प्रति जवाबदेह रहना होगा और वित्तीय रिटर्न उनके लिए एक महत्वपूर्ण वैध हित होगा।
नोएल का तर्क है कि ऐसी स्थिति में किसी मुश्किल में फंसी ग्रुप कंपनी की मदद करने या ऐसे लंबे समय वाले प्रोजेक्ट में निवेश करने के फैसले अलग तरह से देखे जा सकते हैं, जिसमें रिटर्न आने में कई साल लगें।
उनके मुताबिक, इसका असर टाटा संस की उस क्षमता पर पड़ सकता है जिसके तहत वह ग्रुप की कंपनियों को मुश्किल समय में समर्थन देती है या लंबे समय वाले नए प्रोजेक्ट्स में निवेश करती है।
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