
IT दिग्गज विप्रो को यूके की एक अदालत से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने कंपनी को अपने एक पूर्व सेल्स एग्जीक्यूटिव को परफॉर्मेंस बोनस की पूरी रकम देने का आदेश दिया है। विप्रो ने बोनस की रकम पर 150,000 डॉलर (करीब ₹1।25 करोड़) की ऊपरी सीमा (कैप) लगाने की कोशिश की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद अब विप्रो को अतिरिक्त 547,000 डॉलर (यानी करीब 400,000 पाउंड, जो भारतीय रुपये में लगभग ₹4।58 करोड़ बनते हैं) चुकाने होंगे।
यह पूरा मामला विप्रो के पूर्व कर्मचारी पी। चंद्रशेकरप्पा से जुड़ा है। उन्होंने यूके के बड़े रिटेलर 'जॉन लेविस पार्टनरशिप' (JLP) के साथ कंपनी के लिए एक बड़ी डील फाइनल कराने में अहम भूमिका निभाई थी। नियमों के मुताबिक, इस डील से होने वाली पहले साल की कमाई का 1% हिस्सा उन्हें बोनस के तौर पर मिलना था। अपील कोर्ट ने माना कि चंद्रशेकरप्पा इस पूरी रकम के हकदार हैं। इससे पहले निचली अदालत (एंप्लॉयमेंट ट्रिब्यूनल) ने विप्रो के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे अब पलट दिया गया है।
जॉन लेविस डील से पहले साल की कमाई का 1% हिस्सा £516,082 (करीब ₹5।85 करोड़ या लगभग $697,000) बनता है। लेकिन विप्रो ने बोनस पर कैप लगाकर चंद्रशेकरप्पा को सिर्फ $150,000 (करीब ₹1।25 करोड़) का ही भुगतान किया था। बाकी बचे करीब $547,000 (लगभग ₹4।58 करोड़) के लिए ही यह पूरी कानूनी लड़ाई लड़ी गई।
दरअसल, विप्रो ने मार्च 2020 में नया बिजनेस और ग्राहक लाने वाले कर्मचारियों को इनाम देने के लिए "किटी बोनस" (Kitty Bonus) नाम की एक स्कीम शुरू की थी। इसके तहत, नए ग्राहक से होने वाली पहले साल की कमाई का 1% सेल्स स्टाफ को दिया जाना था, जिस पर सेक्टर हेड की मंजूरी जरूरी थी। जब यह स्कीम कर्मचारियों को बताई गई, तब इसमें किसी भी ऊपरी सीमा (कैप) का जिक्र नहीं था।
विप्रो के क्लाउड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सर्विसेज डिविजन में काम करने वाले चंद्रशेकरप्पा ने जून 2020 में यह डील पूरी की। उनके मैनेजर की सिफारिश पर, तत्कालीन सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और ग्लोबल हेड किरण देसाई ने उन्हें पूरा 1% बोनस देने की मंजूरी भी दे दी थी।
डील फाइनल होने के बाद विप्रो की एचआर (HR) और कंपनसेशन टीमों ने इसमें नए नियम जोड़ दिए। उन्होंने कहा कि बड़े अमाउंट के लिए टॉप लेवल की मंजूरी जरूरी होगी और बोनस की अधिकतम सीमा $150,000 होगी। कोर्ट की जांच में यह बात भी सामने आई कि कंपनी के अंदर ही कुछ लोगों ने ईमेल के जरिए इस पर चिंता जताई थी कि स्कीम घोषित होने के बाद नियम बदले जा रहे हैं।
निचली अदालत ने विप्रो की इस दलील को मान लिया था कि "जब तक बोनस कर्मचारी को आधिकारिक तौर पर मिल नहीं जाता, तब तक यह कंपनी के विवेक पर निर्भर करता है और वह सीमा लगा सकती है।" लेकिन अपील कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा, "जब एक बार किरण देसाई ने मूल नियमों के तहत बोनस को मंजूरी दे दी, तो कर्मचारी कानूनी रूप से उस पूरी रकम का हकदार हो गया।"
जज ब्रूस कार केसी ने साफ कहा, "एक बार फैसला लेने और मंजूरी देने के बाद विप्रो नियम नहीं बदल सकती (Move the goalposts)।" कोर्ट ने बकाया रकम तुरंत चुकाने का निर्देश दिया है। यह फैसला उन कंपनियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो बोनस देने के बाद नियम बदलने की कोशिश करती हैं। इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक विप्रो ने ईमेल से भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया है।
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