
Police Phone Search Rules in India: आज के डिजिटल दौर में हमारा स्मार्टफोन सिर्फ बात करने का जरिया नहीं है। इसमें हमारी पर्सनल फोटोज, बैंक डिटेल्स, प्राइवेट चैट्स, ईमेल्स और जिंदगीभर का डेटा होता है। ऐसे में अगर अचानक कोई पुलिसकर्मी आपका फोन मांग ले और बोले 'अनलॉक करो', तो क्या करना चाहिए? सोशल मीडिया या असल जिंदगी में अक्सर ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं, जहां सड़क पर चेकिंग के दौरान पुलिसकर्मी किसी का फोन मांगने लगते हैं या उसकी चैट्स चेक करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पुलिस के पास यह अधिकार है? क्या पुलिस बिना वारंट आपका मोबाइल चेक कर सकती है? क्या आपको मना करने का हक है? और अगर आपने फोन देने से मना किया, तो क्या परेशानी हो सकती है? आइए जानते हैं इन सभी सवालों के जवाब...
भारत का कानून जहां एक तरफ प्राइवेसी को मौलिक अधिकार मानता है, वहीं कुछ विशेष हालात में जांच एजेंसियों को कुछ छूट भी देता है। एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक होने के नाते आपको अपने इन अधिकारों के बारे में पता होना बेहद जरूरी है। दरअसल, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (Article 21) हर नागरिक को सम्मान से जीने और 'राइट टू प्राइवेसी' यानी निजता का अधिकार देता है। साल 2017 के प्रसिद्ध जस्टिस केएस पुट्टास्वामी (Justice KS Puttaswamy v. Union of India 2017) बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि प्राइवेसी इंसान की जिंदगी और निजी आजादी का अहम हिस्सा है। इसका मतलब यह है कि आपका फोन, जिसमें आपकी पूरी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ है, उसे पुलिस बिना किसी मजबूत कानूनी वजह के जबरदस्ती चेक नहीं कर सकती। मनमाने तरीके से किसी के फोन में झांकना कानूनन गलत है।
आमतौर पर पुलिस की जांच और तलाशी के नियम देश के क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS के दायरे में आते हैं) से तय होते हैं। पुराने कानून की धारा 165 के तहत पुलिस को बिना वारंट तलाशी लेने का अधिकार तब मिलता है, जब जांच अधिकारी को पूरा भरोसा हो कि किसी अपराध से जुड़ा सबूत उस जगह या डिवाइस में मौजूद है। वारंट का इंतजार करने पर सबूत के मिटाए या नष्ट किए जाने का खतरा हो। पुलिस अधिकारी को बिना वारंट तलाशी लेने की वजह लिखित रूप में दर्ज करनी होती है और इसकी जानकारी तुरंत मजिस्ट्रेट को देनी होती है। चूंकि आज के दौर में स्मार्टफोन ही सबूत का बड़ा जरिया बन चुके हैं, इसलिए कोर्ट्स ने इन नियमों को डिजिटल डिवाइसेज पर भी लागू किया है। यानी अगर पुलिस को किसी अपराध में आपके फोन के अंदर सबूत होने का पक्का शक है, तभी वे ऐसा कदम उठा सकते हैं, लेकिन उन्हें तय प्रक्रिया का पालन करना ही होगा।
हां, अगर आप खुद बिना किसी डर या दबाव के पुलिस को अपना फोन चेक करने की इजाजत (Consent) दे देते हैं, तो उन्हें किसी वारंट की जरूरत नहीं होती। लेकिन इस इजाजत की कुछ शर्तें हैं। आपको पूरी तरह पता होना चाहिए कि पुलिस आपके फोन में क्या और क्यों चेक कर रही है। आप पर किसी तरह का डर, धमकी या दबाव न बनाया गया हो। अगर आपको रास्ते में रोककर दबाव में फोन लिया जाता है, तो उसे कानूनन आपकी मर्जी नहीं माना जाएगा। ऐसी स्थिति में आप बेहद शांति और तमीज से कह सकते हैं,'सर, मैं अपना फोन चेक करने की अनुमति नहीं दे सकता। क्या आपके पास इसका वारंट है?' ऐसा कहने पर आपके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती।
UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम)
देश की सुरक्षा और गंभीर अपराधों से जुड़े कुछ खास कानूनों में पुलिस या जांच एजेंसियों को बिना वारंट के भी डिवाइस चेक करने या जब्त करने के अधिकार मिलते हैं। UAPA भी ऐसा ही कानून है। यह कानून देश की सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मामलों में लागू होता है, जहां देरी होने पर सबूत मिटने का खतरा हो।
NDPS एक्ट
ड्रग्स और नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में भी पुलिस को बिना वारंट तलाशी की छूट मिलती है, अगर उन्हें लगे कि आरोपी सबूत गायब कर सकता है।
आईटी एक्ट (IT Act)
इस कानून की धारा 69 सरकार को देश की संप्रभुता, सुरक्षा और पब्लिक ऑर्डर के हित में किसी भी डिजिटल डेटा को जांचने या डिक्रिप्ट (अनलॉक) करने की ताकत देती है। लेकिन ध्यान रहे, इन गंभीर मामलों में भी तय कानूनी प्रक्रियाओं और सीनियर अफसरों की मंजूरी के बाद ही कार्रवाई होती है। आमतौर पर सड़क पर चलते किसी भी व्यक्ति पर ये नियम लागू नहीं होते।
यह डिजिटल अधिकारों का सबसे बड़ा पॉइंट है। संविधान का अनुच्छेद 20(3) हर नागरिक को 'राइट अगेंस्ट सेल्फ-इन्क्रिमिनेशन' देता है। इसका मतलब है कि 'किसी भी आरोपी को खुद के खिलाफ गवाही देने या सबूत पेश करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।'
पासवर्ड या पिन (PIN) के लिए नियम
कानून विशेषज्ञों के मुताबिक, इस अधिकार के तहत पुलिस आपको अपने फोन का पासवर्ड या पिन बताने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।
फिंगरप्रिंट या फेस आईडी (Biometrics)
यह थोड़ा उलझा हुआ मामला है। कुछ जानकारों का मानना है कि बायोमेट्रिक्स को जबरन अनलॉक कराना भी प्राइवेसी का उल्लंघन है, हालांकि इस पर अदालतों के अलग-अलग रुख रहे हैं। लेकिन मूल सिद्धांत हमेशा नागरिक की प्राइवेसी के पक्ष में मजबूत रहता है। सु्रीम कोर्ट ने सेलवी बनाम कर्नाटक (Selvi v. State of Karnataka 2010) राज्य मामले में भी साफ किया था कि किसी की मर्जी के बिना उसका नार्को टेस्ट या ब्रेन-मैपिंग करना गलत है, और यही बात डिजिटल लॉक खोलने पर भी लागू होती है।
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