
Engineers Day 2025: आज लड़कियां हर फील्ड में नाम कमा रही हैं, लेकिन 1900 के शुरुआती दौर में हालात बिल्कुल अलग थे। उस समय लड़कियों की पढ़ाई को अहमियत नहीं दी जाती थी। लड़कियों का कॉलेज जाना लगभग नामुमकिन सपना माना जाता था। पढ़ाई पूरी होते ही माता-पिता शादी कर देते थे। ऐसे दौर में जब इंजीनियरिंग जैसे मुश्किल और पुरुष प्रधान समझे जाने वाले कोर्स की बात आती थी, तो किसी लड़की का नाम तक सोच पाना कठिन था। लेकिन इसी माहौल में तीन हिम्मती लड़कियों- ए ललिता, पीके थ्रेसिया और लीला जॉर्ज ने वो कर दिखाया जो आज इतिहास का हिस्सा है। इन तीनों ने भारत में पहली बार इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लिया और 1944 में अपनी डिग्री हासिल करके नई मिसाल कायम की।
चेन्नई (तब मद्रास) का गिंडी इंजीनियरिंग कॉलेज, जो एशिया का सबसे पुराना टेक्निकल इंस्टीट्यूट था। यहीं से इन तीन लड़कियों की कहानी शुरू हुई। कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ केसी चाको और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर ए सुब्बाराव, जो खुद ललिता के पिता थे, ने लड़कियों को एडमिशन दिलवाने में अहम भूमिका निभाई। 1940 में ललिता को सबसे पहले एडमिशन मिला। उसके कुछ महीनों बाद ही थ्रेसिया और लीला को भी यहां एडमिशन मिला।
उस समय सिर्फ तीन ही ब्रांच थे, सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल। कोर्स चार साल का था, लेकिन वर्ल्ड वॉर के कारण इसे घटाकर साढ़े तीन साल कर दिया गया। थ्रेसिया और लीला को सिविल इंजीनियरिंग मिली। ललिता ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग चुनी। चूंकि कॉलेज में लड़कियों का हॉस्टल नहीं था, इसलिए थ्रेसिया और लीला को रोज दूर से सफर करके आना पड़ता था। वहीं ललिता अपने पिता के साथ कैंपस में ही रहती थीं, जिससे उनकी पढ़ाई थोड़ी आसान हो गई। 1944 में तीनों ने अपनी-अपनी डिग्री हासिल की। दिलचस्प बात ये रही कि डिग्री सर्टिफिकेट पर लिखा 'He' काटकर, वाइस चांसलर को अपने हाथ से 'She' लिखना पड़ा।
पीके थ्रेसिया कोचीन राज्य के एक समृद्ध परिवार से थीं। इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद उन्होंने पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) जॉइन किया और कई बड़ी-बड़ी परियोजनाओं का नेतृत्व किया। उन्होंने त्रिशूर मेडिकल कॉलेज और कई महत्वपूर्ण पुलों व सड़कों का निर्माण कराया। 1956 में जब केरल राज्य बना तो थ्रेसिया को प्रमोशन मिलता गया और 1971 में वे चीफ इंजीनियर के पद तक पहुंचीं। यह उपलब्धि उस दौर में किसी महिला के लिए बड़ी बात थी। थ्रेसिया ने शादी नहीं की और अपना पूरा जीवन अपने इंजीनियरिंग प्रोफेशन को समर्पित कर दिया। 1980 में बीमारी के कारण उनका निधन हुआ, लेकिन उनका काम आज भी जिंदा है।
लीला जॉर्ज का जन्म त्रिवाला में हुआ था। शुरू में उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई करने की कोशिश की, लेकिन डिसेक्शन देखकर डर गईं और कोर्स छोड़ दिया। उनके पिता ने हिम्मत नहीं हारी और उन्हें इंजीनियरिंग में एडमिशन दिलवाया। इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद लीला ने त्रावणकोर PWD में काम शुरू किया। बाद में वे हायर एजुकेशन के लिए इंग्लैंड भी गईं और टाउन प्लानिंग में एक्सपर्टिज हासिल की। वापस आने के बाद उन्होंने कई प्रोजेक्ट्स पर काम किया। जवाहर नगर कॉलोनी, तिरुवनंतपुरम जैसी आधुनिक बस्तियों की प्लानिंग भी उन्हीं की देन है। हालांकि कैडर इंटीग्रेशन की वजह से उनकी सीनियरिटी छिन गई और वे डिप्टी चीफ इंजीनियर के पद पर ही रिटायर हो गईं। 1988 में उनका निधन हो गया।
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ललिता की कहानी भी बेहद प्रेरणादायक है। कम उम्र में शादी और फिर पति के निधन के बाद, उनके पिता ने उन्हें इंजीनियरिंग पढ़ने का मौका दिया। ललिता ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। डिग्री के बाद उन्होंने बिहार के जमालपुर रेलवे वर्कशॉप में अप्रेंटिस के तौर पर काम किया। इसके बाद शिमला में सेंट्रल स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया में इंजीनियरिंग असिस्टेंट रहीं। लंदन में इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स से ग्रेजुएटशिप एग्जाम भी पास किया। ए ललिता ने कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम किया, जिनमें से सबसे अहम था, भाखड़ा नांगल बांध का जनरेटर प्रोजेक्ट। यही प्रोजेक्ट उन्हें देशभर में पहचान दिलाने वाला साबित हुआ। 1964 में उन्हें पहले इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑफ वीमेन इंजीनियर्स एंड साइंटिस्ट्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। ललिता का नाम आज भी भारत की पहली महिला इंजीनियर के तौर पर लिया जाता है।
पीके थ्रेसिया, लीला जॉर्ज और ए ललिता, इन तीनों महिलाओं ने उस दौर में इंजीनियरिंग करके समाज की सोच को बदल दिया। आज लाखों लड़कियां इंजीनियरिंग पढ़ रही हैं, लेकिन यह राह इन्हीं पायनियर्स ने बनाई थी।
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