
Viral Reddit Job Post: आजकल की नौकरियों में कर्मचारियों से क्या उम्मीदें रखी जा रही हैं, इसको लेकर एक Reddit यूजर की पोस्ट ने इंटरनेट पर हलचल मचा दी है। पोस्ट में यूजर ने लिखा है कि अब एक सामान्य सी नौकरी के लिए भी कंपनियां एक साथ तीन लोगों के काम की मांग करती हैं और वो भी सिर्फ एक इंसान से और एक ही सैलरी में। इस पोस्ट को देखने के बाद हजारों लोग अपनी-अपनी कहानियां शेयर करने लगे, जिससे ये साफ हो गया कि यह केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि आज की नौकरी की हकीकत बन चुकी है।
पोस्ट करने वाले यूजर ने बताया कि उन्होंने हाल ही में एक जॉब ओपनिंग देखी जिसमें कैंडिडेट से डिग्री, पांच साल से ज्यादा का अनुभव, ग्राफिक डिजाइन, सोशल मीडिया मैनेजमेंट, वीडियो एडिटिंग, एक्सेल एक्सपर्टीज, कस्टमर सर्विस, और डेटा एनालिसिस जैसे कई स्किल्स की मांग की गई थी। लेकिन इसके बदले में ऑफर किया गया वेतन केवल $50,000 (लगभग ₹42.7 लाख प्रति वर्ष) था, वो भी बिना किसी एक्स्ट्रा लाभ या सुविधा के।
यूजर ने सवाल किया: “क्या अब यही नई नॉर्मल नौकरी है? क्या अब हर कोई एक साथ तीन लोगों का काम करने के लिए मजबूर है? क्या ये सब आर्थिक मंदी की वजह से है या ये कंपनियों की नई स्ट्रैटेजी बन चुकी है? क्या हमें धीरे-धीरे ये यकीन दिलाया जा रहा है कि बर्नआउट होना अब आम बात है?”
यह सवाल इंटरनेट पर तेजी से फैल गया और हजारों लोगों ने अपनी बात रखी। एक यूजर ने प्रतिक्रिया में लिखा, “जब भी अर्थव्यवस्था में कोई बड़ी समस्या आती है, कंपनियां उसकी भरपाई कर्मचारियों पर दबाव बढ़ाकर करती हैं। और जब सब कुछ ठीक हो जाता है, तब भी वो उसी सिस्टम को बनाए रखती हैं जैसे ये अब ‘नॉर्मल’ हो चुका हो।”
एक अन्य यूजर ने कहा, “मैंने अपनी नौकरी में सिर्फ अपने काम से शुरुआत की थी, लेकिन धीरे-धीरे जो भी लोग नौकरी छोड़ते गए, उनकी जिम्मेदारियां भी मुझ पर डाल दी गईं। जब मैंने सैलरी बढ़ाने की बात की, तो मैनेजर ने कहा कि ‘हम छोटी कंपनी हैं, और सबको एक-दूसरे का काम आना चाहिए’। अब मैंने नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया है।”
कई लोगों ने ये भी कहा कि 2008 की आर्थिक मंदी के बाद से यह ट्रेंड और तेज हो गया है। एक यूजर ने लिखा, “2008 में जो आर्थिक संकट आया, उसने अमीरों को और अमीर बनाया और मिडल क्लास वर्कर्स की हालत खराब कर दी। तब से लेकर अब तक, पैसे का बहाव केवल ऊपर की तरफ रहा है। यह एक सोच-समझकर बनाया गया सिस्टम लगता है न कि कोई प्राकृतिक आपदा।”
ऐसी तमाम कहानियों ने इस बात पर रोशनी डाली है कि कैसे आज के समय में कर्मचारी न सिर्फ बर्नआउट का शिकार हो रहे हैं, बल्कि उन्हें कम सैलरी में, बिना सुविधाओं के, कई जिम्मेदारियां उठानी पड़ रही हैं। इस पूरी बहस ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, क्या वाकई अब काम करने का तरीका इतना बदल गया है कि इंसानों से मशीनों जैसी परफॉर्मेंस की उम्मीद की जा रही है? या फिर यह पूंजीवाद की एक नई और खतरनाक शक्ल है, जहां इंसान की मेहनत का मोल घटता जा रहा है?
जहां एक तरफ टेक्नोलॉजी और स्किल्स की मांग बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर कर्मचारियों को पर्याप्त इकोनॉमिक और मेंटल हेल्प न मिल पाना, आज की कॉर्पोरेट दुनिया की एक गंभीर सच्चाई बन चुका है। ये Reddit पोस्ट बस एक शुरुआत थी, जिसने लाखों लोगों को अपनी आवाज उठाने का मौका दिया।
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