
नई दिल्ली: एक तरफ जहां आज के युवा लाखों रुपये की सैलरी और सम्मान वाली सरकारी नौकरी पाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, वहीं 25 साल के एक इंजीनियर ने देश की प्रतिष्ठित 'महारत्न' कंपनी में अपनी नौकरी सिर्फ दो साल में ही छोड़ दी। हैरानी की बात यह है कि इस नौकरी का पैकेज सालाना 20 लाख रुपये था। लेकिन ऑफिस में पीने के पानी और टॉयलेट जैसी बेसिक सुविधाएं भी नहीं थीं, जिससे तंग आकर उन्होंने यह फैसला लिया।
नौकरी छोड़ने वाले इस नौजवान का नाम सौरभ मित्तल है, जो प्रतिष्ठित NIT कुरुक्षेत्र से ग्रेजुएट हैं। सिर्फ 22 साल की उम्र में उन्होंने भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) में एक शानदार पैकेज पर नौकरी शुरू की थी। सौरभ की पोस्टिंग सिलीगुड़ी में थी, जहां वे पूरे उत्तर बंगाल, सिक्किम और भूटान तक के ऑपरेशन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। सौरभ बताते हैं कि बाहर से बेहद आकर्षक दिखने वाली इस महारत्न PSU की नौकरी की अंदरूनी हकीकत कुछ और ही थी।
अपने मुश्किल भरे काम के माहौल के बारे में बात करते हुए सौरभ ने बताया, "मेरा ऑफिस एक पुराने गोदाम के अंदर था। वहां न तो पीने का साफ पानी था और न ही टॉयलेट। एसी भी खराब था, जिसे मैंने अपने पैसों से ठीक करवाया। मैंने ऑफिस में टॉयलेट न होने की शिकायत मैनेजर, सीनियर अधिकारियों और HR तक कई बार की। लेकिन अधिकारियों का रवैया बेहद खराब था। HR ने कहा कि यह बिजनेस डिपार्टमेंट का मामला है। मैनेजर ने बजट के लिए पूछने की बात कही। लेकिन आखिर में फाइनेंस डिपार्टमेंट ने यह कहकर प्रस्ताव खारिज कर दिया कि ऑफिस में टॉयलेट बनाने से कंपनी को कोई ROI (Return on Investment - यानी निवेश पर कोई फायदा) नहीं होगा!"
गनीमत थी कि सौरभ का घर ऑफिस से सिर्फ 10 मिनट की दूरी पर था, इसलिए उन्हें दिन में कई बार टॉयलेट के लिए घर जाना पड़ता था। वह गुस्से में कहते हैं, "कोलकाता के मेन ऑफिस में एसी कमरों में बैठने वाले अधिकारियों को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि हम ग्राउंड पर किस नर्क में जी रहे थे।"
सौरभ ने ऑफिस के वर्क कल्चर पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने बताया, "वहां छुट्टी जैसा कुछ नहीं था। एक बार मेरे मैनेजर ने साफ-साफ कहा था कि कंपनी में छुट्टियां नहीं मिलतीं, छुट्टी वाले दिन वर्क फ्रॉम होम (WFH) करने के लिए होते हैं। वीकेंड और रविवार को भी आधी रात 12 बजे तक ऑफिस से कॉल आते रहते थे। इतना ही नहीं, मुझसे मेरे काम से कोई लेना-देना न रखने वाले सीनियर अधिकारियों को एयरपोर्ट से पिक करने और उनके लिए होटल बुक करने जैसे निजी काम भी करवाए जाते थे। मीटिंग्स और वीडियो कॉन्फ्रेंस में चिल्लाना और गाली-गलौज करना तो वहां बिल्कुल आम बात थी।"
सिर्फ 3% की सालाना सैलरी बढ़ोतरी और सिर्फ सीनियॉरिटी के आधार पर प्रमोशन की वजह से वहां ग्रोथ की भी कोई उम्मीद नहीं थी। सौरभ ने फैसला किया कि वह इस तरह अपनी पूरी जिंदगी नहीं गुजार सकते और उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। हरियाणा के कैथल जैसे छोटे जिले से आने वाले सौरभ के परिवार के लिए BPCL की नौकरी एक बड़ी प्रतिष्ठा की बात थी। इसलिए उनके पिता आज भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि उनके बेटे ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। लेकिन, बेटे को मिल रही मानसिक प्रताड़ना और देर रात आने वाली कॉल्स को खुद देखने वाली उनकी मां ने पूरा साथ दिया। उन्होंने कहा, "मेरा बेटा ऐसे नर्क में रहे, यह मुझे मंजूर नहीं।"
फिलहाल सौरभ मित्तल गुरुग्राम में हैं और एक प्रतिष्ठित संस्थान से MBA कर रहे हैं ताकि अपने करियर को एक नई दिशा दे सकें। इसके साथ ही, वह अपने खर्चों को पूरा करने और युवाओं को ऐसी नौकरियों की हकीकत बताने के लिए पार्ट-टाइम कंटेंट क्रिएशन (वीडियो ब्लॉगिंग) भी कर रहे हैं। उनकी सलाह है कि युवा पीढ़ी किसी भी सरकारी नौकरी की सिर्फ बाहरी चमक-दमक देखकर फैसला न करे, बल्कि उसकी असलियत को भी समझे।
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