Study Abroad: US-Canada छोड़ अब Germany और France की ओर बढ़ रहे भारतीय छात्र, जानें वजह

Published : Jun 13, 2026, 03:17 PM IST
Study Abroad

सार

रुपये की 10% से अधिक गिरावट से विदेश में पढ़ाई महंगी हो गई है। ट्यूशन फीस और रहने का खर्च बढ़ने से परिवार अतिरिक्त लोन ले रहे हैं। छात्र अब जर्मनी और फ्रांस जैसे किफायती विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।

नई दिल्लीः विदेश जाकर पढ़ाई करने का सपना देख रहे भारतीय छात्रों और उनके परिवारों के लिए रुपये की गिरती कीमत एक बड़ा झटका है। पिछले एक साल में ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की वैल्यू 10% से ज़्यादा कम हो गई है। इसका सीधा असर विदेश में पढ़ाई के कुल खर्च पर पड़ा है, जो काफी बढ़ गया है। इस वजह से कई परिवारों को अपना बजट फिर से बनाना पड़ रहा है, ज़्यादा पैसों का इंतज़ाम करना पड़ रहा है और कुछ मामलों में तो पढ़ाई के लिए चुना गया देश भी बदलना पड़ रहा है।

रुपये में 10% से ज़्यादा की गिरावट का मतलब है कि पढ़ाई का कुल खर्च बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि विदेश में पढ़ाई से जुड़े ज़्यादातर बड़े खर्चे विदेशी करेंसी में ही चुकाने होते हैं। मिसाल के तौर पर, जिन कोर्सेज़ का सालाना खर्च 35 लाख से 70 लाख रुपये के बीच है, अब सिर्फ करेंसी की कीमत में बदलाव के कारण ही उन पर हर साल 4 लाख से 8 लाख रुपये तक का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

यह सिर्फ डॉलर की कहानी नहीं है। ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों समेत उन सभी जगहों की करेंसी के मुकाबले रुपया कमज़ोर हुआ है, जहां भारतीय छात्र बड़ी संख्या में पढ़ने जाते हैं। इसलिए, छात्र चाहे किसी भी देश में जाएं, खर्च बढ़ना तय है।

सबसे बड़ी मार ट्यूशन फीस और रहने के खर्च पर

छात्रों के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा ट्यूशन फीस और रहने के खर्च में जाता है, इसलिए महंगाई की सबसे ज़्यादा मार इन्हीं दो चीज़ों पर पड़ रही है। न्यूयॉर्क, टोरंटो, वैंकूवर, सिडनी और मेलबर्न जैसे बड़े शहरों में महंगाई और घरों की कमी के कारण रहने का खर्च पहले से ही बहुत ज़्यादा है। घर का किराया, किराने का सामान, आने-जाने का खर्च, बिजली-पानी के बिल और दूसरे रोज़मर्रा के खर्चे हर महीने एक्सचेंज रेट में होने वाले बदलावों से प्रभावित होते हैं। इसके अलावा, हवाई जहाज़ के टिकट और हेल्थ इंश्योरेंस के प्रीमियम भी बढ़ गए हैं।

लोन पड़ रहे कम, टॉप-अप का सहारा ले रहे परिवार

कोर्स शुरू होने के समय बनाया गया पूरा फाइनेंशियल बजट अब गड़बड़ा रहा है। इसका सबसे ज़्यादा असर उन छात्रों पर पड़ रहा है जो एजुकेशन लोन पर निर्भर हैं। बैंक लोन के लिए अप्लाई करते समय के एक्सचेंज रेट के हिसाब से रकम मंजूर करते हैं। लेकिन जब लोन पास होने के बाद रुपये की कीमत और गिर जाती है, तो मिली हुई रकम से ट्यूशन फीस और रहने का पूरा खर्च निकालना मुश्किल हो जाता है। जिन लोगों ने एक या दो साल पहले के रेट पर लोन लिया था, उनके लिए अब पैसे कम पड़ रहे हैं। ऐसे में परिवार टॉप-अप लोन लेने, और कर्ज़ ढूंढने या अपनी बचत से पैसा निकालने को मजबूर हो रहे हैं। भविष्य में ऐसी दिक्कतों से बचने के लिए अब कई लोग शुरुआत में ही ज़्यादा रकम का लोन लेने लगे हैं।

छात्र ढूंढ रहे हैं नए रास्ते

रुपये की कीमत गिरने से विदेश में पढ़ाई का क्रेज़ कम नहीं हुआ है, लेकिन छात्र अब देश बदलने पर विचार कर रहे हैं। परिवार अब ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जहां कम खर्च में अच्छी पढ़ाई हो सके।

जर्मनी और फ्रांस: जर्मनी की कई पब्लिक यूनिवर्सिटीज़ में कोई ट्यूशन फीस नहीं है, और फ्रांस में कम खर्च के साथ-साथ स्कॉलरशिप भी मिल जाती है। ये बातें छात्रों को अपनी ओर खींच रही हैं।

आयरलैंड और न्यूज़ीलैंड: इन देशों में भी दिलचस्पी बढ़ रही है क्योंकि यहां पढ़ाई के बाद नौकरी के अच्छे मौके मिलते हैं।

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