
बॉलीवुड म्यूज़िक इंडस्ट्री की चमक-दमक के पीछे छिपी सच्चाई पर म्यूज़िक कंपोज़र अमाल मलिक ने खुलकर बात की है। आम तौर पर दर्शक सिर्फ सुपरहिट गाने सुनते हैं और मान लेते हैं कि उन्हें बनाने वाले आर्टिस्ट्स भी उतनी ही सफलता और पैसा पाते हैं। लेकिन अमाल का कहना है कि हकीकत इससे काफी अलग है। उन्होंने खुलासा किया कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कंपोज़र्स को ना तो उनके काम के मुताबिक पैसा मिलता है और ना ही हमेशा उचित क्रेडिट दिया जाता है। इतना ही नहीं, अपने हक की बात उठाने पर उन्हें कई फिल्मों से बाहर भी कर दिया गया। उनका बयान अब इंडस्ट्री के अंदर चल रहे भेदभाव, रॉयल्टी सिस्टम और आर्टिस्ट्स के अधिकारों पर नई बहस छेड़ रहा है।
अमाल मलिक के अनुसार, बॉलीवुड में म्यूज़िक कंपोज़र्स अक्सर अपने गानों के अधिकार छोड़ने पर मजबूर होते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार गाने म्यूज़िक लेबल्स के लिए भारी मुनाफा कमाते हैं, लेकिन कंपोज़र को सीमित भुगतान ही मिलता है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें कंपोजर बनने के बाद अपने लिए कार खरीदने में 16 साल का वक्त लग गया। पिंकविला से बातचीत में अमाल ने फिल्म 'रॉय' के गाने 'सूरज डूबा है' का उदाहरण देते हुए कहा, "इस गाने ने 60-70 करोड़ रुपए की कमाई की, लेकिन मुझे पब्लिशिंग राइट्स के अलावा कुछ नहीं मिला। जो ना के बराबर है। 1 करोड़ के आसपास भी नहीं।"
अमाल ने इसके आगे बॉलीवुड और साउथ इंडियन सिनेमा की तुलना की और कहा, "साउथ में ऐसे कंपोजर्स हैं, जो राइट्स अपने पास रखते हैं और 10-15 करोड़ रुपए कमाते हैं। हिंदी सिनेमा में कंपोजर्स को 2-3 करोड़ रुपए मिलते हैं आर वे सबकुछ छोड़ देते हैं।" अमाल मानते हैं कि आर्थिक मजबूती कलाकार को स्वतंत्र सोच और बेहतर फैसले लेने की ताकत देती है।
अमाल ने इंडस्ट्री में क्रेडिट को लेकर होने वाली राजनीति पर भी खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा था जब कंपोजरर्स का नाम तक सामने नहीं आता था। उन्होंने खुद अपने नाम को आधिकारिक तौर पर सामने लाने के लिए संघर्ष किया। उनका दावा है कि राइट्स और पहचान के लिए आवाज़ उठाने की वजह से उन्हें कई प्रोजेक्ट्स से बाहर कर दिया गया। उनके मुताबिक, सिस्टम के खिलाफ बोलना आसान नहीं होता, लेकिन चुप रहना उससे भी ज्यादा मुश्किल है।
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