Published : Jan 01, 2026, 10:05 AM ISTUpdated : Jan 01, 2026, 10:41 AM IST
श्रीराम राघवन की इक्कीस उन वॉर फिल्मों में से नहीं है जो दर्शक को जोश से भरने के लिए लगातार शोर करती रहें। यह फिल्म धीमी है, सोचने वाली है और सबसे अहम बात यह अपने किरदारों को बोलने से पहले महसूस करने देती है। जानिए कैसी है धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म…
फिल्म की कहानी 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग से जुड़ी है, लेकिन इक्कीस खुद को सिर्फ जंग के मैदान तक सीमित नहीं रखती। सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की बहादुरी इसकी नींव है, मगर फिल्म का असली फोकस उस असर पर है जो युद्ध लोगों की जिंदगी पर छोड़ता है, सालों बाद भी। कहानी दो टाइमलाइन में चलती है। एक तरफ युवा अरुण खेत्रपाल जंग के मैदान में फैसले ले रहे हैं, दूसरी तरफ कई साल बाद वही जंग यादों और सवालों के रूप में लौटती है। यह स्ट्रक्चर फिल्म को सिर्फ एक वॉर स्टोरी नहीं रहने देता, बल्कि उसे एक इंसानी ड्रामा बनाता है।
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'इक्कीस' में श्रीराम राघवन का निर्देशन
श्रीराम राघवन यहां अपने थ्रिलर इमेज से बिल्कुल अलग नजर आते हैं। इक्कीस में न कोई तेज कट्स हैं, न ही जबरदस्ती का ड्रामा। उनका निर्देशन बहुत कंट्रोल में है।वह जानते हैं कि हर भावना को संवाद में बदलना जरूरी नहीं। कई सीन ऐसे हैं जहां कैमरा बस किरदार के चेहरे पर रुकता है और वही सीन की जान बन जाता है। युद्ध के सीन भी सीमित हैं। न ज्यादा लंबे, न ज्यादा स्टाइलिश। राघवन का फोकस जंग की भव्यता पर नहीं, उसके असर पर है। यही संयम फिल्म को भारी नहीं बनने देता, जबकि विषय गंभीर है।
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'इक्कीस' में स्टार कास्ट की एक्टिंग
जयदीप अहलावत इस फिल्म के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक हैं। उनका किरदार ऊंची आवाज में कुछ नहीं कहता, लेकिन हर सीन में उसका वजन महसूस होता है। वह एक ऐसे सैनिक की भूमिका में हैं, जिसने बहुत कुछ देखा है और अब शब्दों से ज्यादा खामोशी पर भरोसा करता है।जयदीप की परफॉर्मेंस इसलिए खास लगता है क्योंकि वह कुछ साबित करने की कोशिश नहीं करते। उनके चेहरे की शांति, आंखों की थकान और बोलने का सादा तरीका किरदार को बेहद रियल बनाता है। धर्मेंद्र के साथ उनके सीन फिल्म को एक अलग भावनात्मक स्तर पर ले जाते हैं। यहां न कोई भाषण है, न कोई फैसला। बस यादें हैं और एक साझा अनुभव। अगस्त्य नंदा अरुण खेत्रपाल के रोल में सच्चे लगते हैं। वह अपने किरदार को हीरो बनाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि एक जिम्मेदार युवा अफसर की तरह पेश करते हैं। उनका जोश और असमंजस दोनों साफ दिखते हैं। धर्मेंद्र की मौजूदगी फिल्म को गहराई देती है। वह कम बोलते हैं, लेकिन उनका हर सीन भावनात्मक असर छोड़ता है। पिता के तौर पर उनका दर्द और गर्व दोनों महसूस होते हैं। सिमर भाटिया का रोल छोटा है, लेकिन कहानी में जरूरी संतुलन लाता है। वह फिल्म को हल्का इमोशनल टच देती हैं, बिना कहानी से ध्यान हटाए।
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टेक्निकली कैसी है 'इक्कीस'?
फिल्म की स्क्रिप्ट सधी हुई है। यहां कोई संवाद ऐसा नहीं लगता जिसे ताली के लिए लिखा गया हो। बातचीत सामान्य लगती है, जैसे असली जिंदगी में होती है। कई बार चुप्पी ही सबसे बड़ा संवाद बन जाती है।पटकथा यह समझाती है कि हर सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं। कुछ चीजें अधूरी रहना ही फिल्म के असर को बढ़ाता है।इक्कीस का बैकग्राउंड स्कोर बहुत सीमित इस्तेमाल में आता है। जंग के सीन में आवाजें ज्यादा बोलती हैं और भावनात्मक हिस्सों में सन्नाटा। वीएफएक्स जरूरत भर का है। टैंक सीन रियल लगते हैं, दिखावटी नहीं। कैमरा वर्क और एडिटिंग फिल्म की धीमी लेकिन मजबूत गति को बनाए रखते हैं।
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क्यों देखें 'इक्कीस'
'इक्कीस' जयदीप अहलावत की शांत परफॉर्मेंस और श्रीराम राघवन के संयमित निर्देशन की वजह से अलग पहचान बनाती है। यह फिल्म जंग की कहानी जरूर है, लेकिन उससे ज्यादा उन यादों की है जो लड़ाई खत्म होने के बाद भी साथ रहती हैं।यह फिल्म उन दर्शकों के लिए है जो शोर नहीं, असर ढूंढते हैं।