
अगर आप क्राइम, डाकू और पुलिस के बीच होने वाली बिल्ली-चूहे की कहानी देखना पसंद करते हैं, तो 'घमासान' आपके लिए दिलचस्प हो सकती है। तिग्मांशु धूलिया की यह फिल्म बुंदेलखंड की उस दुनिया में ले जाती है, जहां एक तरफ करीब तीन दशक से इलाके में खौफ कायम किए बैठे डाकू महाराज हैं तो दूसरी तरफ उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी संभालने वाला ईमानदार IPS अफसर आदित्य।
फिल्म में अरशद वारसी और प्रतीक गांधी पहली बार एक-दूसरे के आमने-सामने ऐसी भूमिकाओं में दिखाई देते हैं, जो दोनों की पिछली इमेज से काफी अलग हैं। हालांकि, फिल्म का आइडिया मजबूत होने के बावजूद कहानी हर जगह एक जैसी पकड़ नहीं बना पाती।
कहानी बुंदेलखंड के बीहड़ों और गांवों से शुरू होती है, जहां महाराज यानी अरशद वारसी का खौफ लंबे समय से कायम है। वह सिर्फ बंदूक के दम पर नहीं, बल्कि राजनीति और स्थानीय प्रभाव के सहारे भी अपनी पकड़ बनाए हुए है। पुलिस के पास महाराज की तस्वीर तक नहीं है। ऐसे में उसके गैंग के एक सदस्य से मिली जानकारी पुलिस के लिए बड़ी उम्मीद बनती है, लेकिन इसके बाद घटनाएं तेजी से बिगड़ती हैं।
इलाके में चुनाव करीब हैं और इसी बीच IPS अधिकारी आदित्य यानी प्रतीक गांधी को वहां कानून-व्यवस्था संभालने के लिए भेजा जाता है। आदित्य का मकसद सिर्फ चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से कराना है, लेकिन हालात उसे महाराज के पीछे जाने के लिए मजबूर कर देते हैं। इसके बाद शुरू होता है दोनों के बीच एक लंबा cat-and-mouse game, जिसमें राजनीति, धोखा, सत्ता और बदले की कहानी भी जुड़ती जाती है।
'घमासान' की सबसे बड़ी ताकत अरशद वारसी हैं। कॉमेडी और 'मुन्नाभाई' के सर्किट जैसे किरदारों के लिए मशहूर अरशद यहां बिल्कुल अलग अवतार में नजर आते हैं। महाराज का किरदार कम बोलता है, लेकिन उसकी मौजूदगी ही डर पैदा करती है। अरशद ने इस खौफ को अपनी बॉडी लैंग्वेज, हंसी और आंखों के जरिए काफी प्रभावी बनाया है। दिलचस्प बात यह है कि तिग्मांशु धूलिया ने अरशद को विलेन के रूप में चुनने का फैसला उनके 'सेहर' में काम से प्रभावित होकर किया था। निर्देशक के मुताबिक अरशद एक ऐसे अभिनेता हैं जो किरदार को खुलकर जीते हैं।
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दूसरी तरफ प्रतीक गांधी ने IPS अधिकारी आदित्य के किरदार को काफी सहजता से निभाया है। उनका किरदार महाराज के बिल्कुल उलट है. शांत, गंभीर और अपने काम को लेकर प्रतिबद्ध। आदित्य किसी बड़े फिल्मी हीरो की तरह हर समस्या का समाधान गोली से नहीं करता। वह हालात को समझते हुए महाराज तक पहुंचने की कोशिश करता है। यही बात दोनों किरदारों के बीच मुकाबले को दिलचस्प बनाती है।
तिग्मांशु धूलिया की फिल्मों में हिंदी हार्टलैंड, अपराध, राजनीति और सत्ता का खेल अक्सर देखने को मिलता है। 'घमासान' भी इसी दुनिया को आगे बढ़ाती है। ध्य प्रदेश और बुंदेलखंड के खुरदरे इलाकों में फिल्म की शूटिंग ने कहानी को रियलिस्टिक टच दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अरशद ने महाराज के किरदार के लिए वजन भी बढ़ाया और बुंदेली भाषा पर काम किया था।
'घमासान' की सबसे बड़ी समस्या इसकी कहानी का हर जगह एक जैसा जुड़ा हुआ न लगना है। कुछ हिस्से काफी पकड़ बनाते हैं, लेकिन बीच-बीच में ऐसे सीन आते हैं जो मुख्य कहानी से थोड़ा अलग महसूस होते हैं। फिल्म में हिंसा काफी ज्यादा और कुछ जगह बेहद ग्राफिक है। वहीं एक्शन और पीछा करने वाले सीक्वेंस उम्मीद के मुताबिक बहुत शानदार नहीं लगते।
कुछ सपोर्टिंग किरदारों को भी ज्यादा जगह नहीं मिल पाती। उनकी कहानियां शुरू तो होती हैं, लेकिन पूरी तरह विकसित नहीं हो पातीं। इसी वजह से फिल्म का लगभग ढाई घंटे का रनटाइम कुछ जगह थोड़ा लंबा महसूस होता है। Times of India ने भी फिल्म की कहानी को असमान बताते हुए एडिटिंग को और चुस्त किए जाने की जरूरत बताई है।
फिल्म में राजपाल यादव का स्क्रीन टाइम सीमित है, लेकिन वह अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में कामयाब रहते हैं। वहीं जटिन गोस्वामी भी महाराज के करीबी के रूप में ध्यान खींचते हैं। सपोर्टिंग कास्ट में दोनों का काम कहानी को सहारा देता है।
'घमासान' आप ZEE5 पर देख सकती हैं। यह फिल्म 11 सितंबर 2026 से ZEE5 पर स्ट्रीम हो रही है और इसकी अवधि करीब 2 घंटे 22 मिनट है।
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