
Hanuman Ansh Movie: आजकल सिनेमाघरों में पौराणिक कहानियों पर बड़े-बड़े बजट, एक्शन और वीएफएक्स (VFX) की भरमार दिखती है। ऐसे में डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी की फिल्म 'हनुमान अंश' एक बिल्कुल अलग, शांत और दिल को छू लेने वाला रास्ता चुनती है। यह फिल्म केवल पूजा-पाठ या अलौकिक शक्तियों की बात नहीं करती, बल्कि यह दिखाती है कि असली आध्यात्मिकता का मतलब है कि हम इंसानों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं।
फिल्म का नाम सुनते ही पहला सवाल आता है-क्या यह हनुमान जी के बारे में है या संत नीम करौली बाबा के बारे में? मजेदार बात यह है कि इसका जवाब 'दोनों' है। यही इस फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज एलिमेंट है। कहानी मुख्य रूप से नीम करौली बाबा की शुरुआती जिंदगी और हनुमान जी के प्रति उनके अटूट विश्वास पर बनी है। फिल्म में एक छोटे बच्चे की अपनी गुमशुदा मां को खोजने की जिद किस तरह धीरे-धीरे ईश्वर की तलाश और दूसरों की सेवा में बदल जाती है, इसे बहुत ही संवेदनशीलता से दिखाया गया है।
कहानी की शुरुआत लक्ष्मण नाम के एक छोटे बच्चे से होती है (जिन्हें उनके पिता लक्ष्मी कहते थे और जो बाद में नीम करौली बाबा बने)। जब बचपन में उनकी मां का निधन हो जाता है, तो किसी ने उनसे कहा कि मां 'भगवान राम के पास' चली गई हैं। मासूम बच्चे ने इसे सीधी बात मान ली कि मां कहीं बैठी है और उसे वहां जाना है। लेकिन राम तक पहुंचे कैसे? रास्ते का पता केवल राम के सबसे बड़े भक्त-हनुमान जी के पास ही हो सकता था। बस यहीं से मां की तलाश, राम की खोज में बदल गई और राम की खोज ने उन्हें हनुमान भक्ति से जोड़ दिया। 'हनुमान अंश' का यही मतलब है-किसी देवता की पौराणिक कथा नहीं, बल्कि उनके एक अंश जैसे इंसान बनने का सफर।
1943 का दौर था। ब्रिटिश सरकार से छिपते-छिपाते एक स्वतंत्रता सेनानी 15 दिनों से भूखा बैठा था। तभी एक संत आकर उसे खाना दे जाते हैं-जैसे उन्हें सब पहले से पता हो। फिल्मों में ऐसे सीन्स पर जोर-जोर से बैकग्राउंड म्यूजिक और दैवीय चमत्कार दिखाए जाते हैं, लेकिन 'हनुमान अंश' चमत्कार से ज्यादा उस इंसान के दिल को समझती है। 12 साल के लक्ष्मी (जिसका किरदार अभिनेता शोभिनव सत्य ने निभाया है) की कहानी किसी भारी-भरकम ज्ञानी की नहीं, बल्कि एक ऐसे लड़के की है जो मां के बिछड़ने के दर्द से टूटा हुआ है।
फिल्म लगातार एक ही बात पर जोर देती है-अगर आपकी आस्था आपके स्वभाव और व्यवहार को नहीं सुधारती, तो उस भक्ति का कोई मोल नहीं है। फिल्म में नीम करौली बाबा के छोटे-छोटे सेवा कार्य दिखाए गए हैं:
7 अगस्त 2026 को रिलीज हुई विशाल चतुर्वेदी की 'हनुमान अंश' आज बिना किसी बड़े स्टारकास्ट के भी हाउसफुल चल रही है। वजह साफ है-यह दर्शकों पर थोपती नहीं है कि वे क्या मानें। यह प्रेम, दुख, दया और पश्चाताप जैसी इंसानी भावनाओं से बात करती है। अगर आप नीम करौली बाबा के बारे में कुछ भी नहीं जानते, तब भी यह फिल्म आपको बांधकर रखती है। यह बताती है कि एक सच्चा भक्त वही है, जो दूसरों के दर्द को अपना समझे। यही वजह है कि युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई थिएटर से बाहर निकलते वक्त एक अलग शांति महसूस कर रहा है।
फिल्म की एक खासियत यह भी है कि इसे समझने के लिए दर्शक का नीम करौली बाबा की पूरी जीवन-कथा जानना जरूरी नहीं है। न ही हिंदू दर्शन की गहरी जानकारी होना आवश्यक है। कहानी के मूल भाव काफी मानवीय हैं-मां को खोजता बच्चा, भूखा व्यक्ति, परेशान परिवार, शोषण झेलती महिला, रिश्तों में तनाव और माफी की तलाश करता इंसान। इन सामान्य मानवीय अनुभवों के जरिए फिल्म धीरे-धीरे आस्था की तरफ बढ़ती है। यही तरीका इसे सिर्फ धार्मिक कहानी के दायरे से बाहर निकालकर एक मानवीय कहानी भी बना देता है।
आज जब पौराणिक फिल्मों में बड़े सेट, VFX और एक्शन को काफी महत्व दिया जा रहा है, ‘हनुमान अंश’ अपेक्षाकृत निजी और भावनात्मक कहानी का सहारा लेती है। फिल्म दर्शकों को शुरुआत में यह बताने की कोशिश नहीं करती कि उन्हें क्या मानना चाहिए। इसके बजाय वह पहले एक कहानी सुनाती है—एक बच्चे की, जो अपनी मां को खो चुका है और उसे पाने की कोशिश में आध्यात्मिक रास्ते पर आगे बढ़ता है। यात्रा के दौरान उसकी समझ बदलती जाती है। उसे एहसास होता है कि शायद भगवान तक पहुंचने का रास्ता केवल ऊपर देखने में नहीं, बल्कि अपने आसपास मौजूद लोगों को देखने में भी है। यही विचार युवा दर्शकों के लिए फिल्म को प्रासंगिक बना सकता है।
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