
33 साल पहले 'दामिनी' में वकील बनकर सनी देओल ने बॉलीवुड के सबसे यादगार कोर्टरूम किरदारों में अपनी जगह बनाई थी। अब 'इक्का' के जरिए उन्होंने पहली बार OTT पर ब्लैक कोट पहनकर वापसी की है। सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा के निर्देशन में बनी यह फिल्म सिर्फ कोर्टरूम ड्रामा नहीं, बल्कि रिश्तों, नैतिकता और इंसाफ के बीच फंसे एक वकील की भावनात्मक कहानी भी है। फिल्म में सनी देओल और अक्षय खन्ना की टक्कर हर सीन को रोमांचक बनाती है। हालांकि स्क्रीनप्ले कहीं-कहीं धीमा पड़ता है, लेकिन क्लाइमैक्स पूरी मेहनत का इनाम देता है।
फिल्म के केंद्र में मशहूर वकील अर्जुन मेहरा (सनी देओल) हैं, जो हमेशा कमजोर और पीड़ित लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन हालात ऐसे बनते हैं कि उन्हें अपने सबसे बड़े विरोधी शौर्यमान गौर (अक्षय खन्ना) का केस लड़ना पड़ता है, जिस पर हत्या की कोशिश का आरोप है। दूसरी ओर जूनियर वकील मथुरा बनर्जी (तिलोत्तमा शोम) शौर्यमान को दोषी साबित करने में जुटी है। कहानी आगे बढ़ते हुए इंसाफ, नैतिकता और निजी रिश्तों के बीच संघर्ष की ऐसी लड़ाई बन जाती है, जहां हर फैसला मुश्किल है। अंतिम 20 मिनट फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज हैं।
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सनी देओल पूरी फिल्म की जान हैं। उनका गुस्सा, संयम और इमोशनल परफॉर्मेंस इस बार पहले से ज्यादा परिपक्व नजर आता है। कोर्टरूम के कई सीन्स में उनका स्क्रीन प्रेजेंस शानदार है। अक्षय खन्ना एक बार फिर निगेटिव शेड में कमाल करते हैं। उनका शांत अंदाज, डायलॉग डिलीवरी और रहस्यमयी व्यक्तित्व हर सीन को मजबूत बनाता है। तिलोत्तमा शोम फिल्म की सबसे सुखद सरप्राइज हैं। उन्होंने कोर्टरूम में सनी देओल के सामने बेहद प्रभावशाली अभिनय किया है। दीया मिर्जा ने कम स्क्रीन टाइम में गहरी छाप छोड़ी है, जबकि संजीदा शेख और आकांक्षा रंजन कपूर भी अपने किरदारों के साथ न्याय करती हैं।
सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने कहानी को जरूरत से ज्यादा मसालेदार बनाने की बजाय यथार्थवादी अंदाज में पेश किया है। उन्होंने कोर्टरूम ड्रामा को ओवरड्रामैटिक होने से बचाया है और सनी-अक्षय की भिड़ंत को संतुलित तरीके से पेश किया है। हालांकि इंटरवल के बाद कुछ हिस्सों में फिल्म की गति धीमी हो जाती है, लेकिन क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते निर्देशक फिर पकड़ मजबूत कर लेते हैं। अंतिम खुलासा दर्शकों को संतुष्ट करता है।
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'इक्का' का फोकस गानों से ज्यादा कहानी और कोर्टरूम ड्रामा पर है। बैकग्राउंड स्कोर कई अहम दृश्यों में तनाव और रोमांच को बढ़ाता है। इमोशनल सीन्स में संगीत कहानी का प्रभाव बढ़ाने में सफल रहता है। फिल्म में म्यूजिक कहानी पर हावी नहीं होता, बल्कि उसे सपोर्ट करता है।
सिनेमैटोग्राफी कोर्टरूम और इमोशनल दृश्यों को प्रभावी बनाती है। एडिटिंग पहले हाफ में अच्छी है, लेकिन दूसरे हाफ में 15-20 मिनट की सुस्ती महसूस होती है। कोर्टरूम की प्रोडक्शन डिजाइन वास्तविक लगती है। साउंड डिजाइन और कैमरा वर्क कहानी के तनाव को बढ़ाने में मदद करते हैं। तकनीकी रूप से फिल्म मजबूत है, हालांकि स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स थोड़े और धारदार हो सकते थे।
'इक्का' सनी देओल के OTT करियर की शानदार शुरुआत है। यह फिल्म सिर्फ स्टार पावर पर नहीं, बल्कि मजबूत अभिनय, इमोशनल कहानी और दमदार क्लाइमैक्स पर टिकी है। अगर आपको कोर्टरूम ड्रामा, सस्पेंस और बेहतरीन एक्टिंग पसंद है तो 'इक्का' आपके वीकेंड की अच्छी पसंद बन सकती है। हमारी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार।
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