
‘तीसरी बेगम’ के जरिए अनुभवी फिल्ममेकर के.सी. बोकाडिया एक बार फिर सामाजिक मुद्दे को बड़े पर्दे पर लेकर आए हैं। ‘तेरी मेहरबानियां’, ‘कुदरत का कानून’, ‘लाल बादशाह’ और ‘प्यार झुकता नहीं’ जैसी कई सफल फिल्में बना चुके बोकाडिया इस बार महिला सशक्तिकरण पर आधारित कहानी लेकर दर्शकों के सामने पहुंचे हैं। फिल्म में मुग्धा गोडसे, कायनात अरोड़ा, जरीना वहाब, रचना श्याम और केविन गांधी अहम भूमिकाओं में नजर आते हैं।
बीएमबी प्रोडक्शन के बैनर तले बनी ‘तीसरी बेगम’ एक सोशल ड्रामा है, जिसकी कहानी पूजा दीक्षित नाम की एक साधारण लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है। शादी के बाद उसकी जिंदगी अचानक बदल जाती है, जब उसे पता चलता है कि उसके पति बब्बन खान की पहले से दो पत्नियां मौजूद हैं। इतना ही नहीं, पूजा का नाम भी बदलकर नगमा रख दिया जाता है, जिससे उसकी पहचान और अस्तित्व दोनों पर सवाल खड़े हो जाते हैं। हालांकि कहानी केवल दर्द और धोखे तक सीमित नहीं रहती। फिल्म का दिलचस्प मोड़ तब आता है, जब पूजा की मुलाकात अपने पति की दूसरी पत्नियों शबाना और तबस्सुम से होती है। शुरुआत में एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी दिखाई देने वाली ये महिलाएं बाद में अपने अधिकार और सम्मान के लिए एकजुट हो जाती हैं। इसके बाद फिल्म महिलाओं के संघर्ष, आत्मसम्मान और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की कहानी बन जाती है।
डायरेक्टर के.सी. बोकाडिया ने संवेदनशील विषय को काफी संतुलित तरीके से पेश किया है। फिल्म कई सामाजिक सवाल उठाती है और रिश्तों के भीतर छिपे शोषण को सामने लाने की कोशिश करती है। संवादों और भावनात्मक दृश्यों को प्रभावशाली ढंग से फिल्माया गया है, जिससे कहानी दर्शकों से जुड़ने में सफल रहती है। फिल्म की शूटिंग लखनऊ और बनारस की वास्तविक लोकेशनों पर की गई है, जो इसकी कहानी को और प्रामाणिक बनाती हैं। कई दृश्य ऐसे हैं जहां शहर और गलियां खुद एक किरदार की तरह महसूस होती हैं।
एक्टिंग की बात करें तो मुग्धा गोडसे, कायनात अरोड़ा, जरीना वहाब, रचना श्याम और केविन गांधी ने अपने किरदारों को सहजता के साथ निभाया है। खासतौर पर महिला किरदारों की भावनाओं और संघर्ष को कलाकारों ने प्रभावी ढंग से स्क्रीन पर उतारा है। फिल्म का संगीत और एक्शन भी कहानी के साथ तालमेल बनाकर चलते हैं। तकनीकी रूप से भी फिल्म संतुलित नजर आती है। कुल मिलाकर ‘तीसरी बेगम’ एक ऐसी कमर्शियल सोशल ड्रामा फिल्म है, जो मनोरंजन के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण का संदेश भी देने की कोशिश करती है। अगर आप सामजिक मुद्दों पर बनी फ़िल्में देखने के शौक़ीन हैं तो थिएटर में जाकर इसे देख डालिए। हमारी ओर से इस मूवी को 5 में से 3.5 स्टार।
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