उज्जैन. उत्तराखंड के चारों धामों गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ में से केदारनाथ ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के सबसे पवित्र तीर्थों में से एक माना जाता है। बर्फ से घिरी पहाड़ियों और पहाड़ों से बहती नदियों के बीच केदारनाथ मंदिर प्राकृतिक सुंदरता से भरा हुआ है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया था। कैसे पहुंचे? केदारनाथ चंडीगढ़ से (387), दिल्ली से (458), नागपुर से (1421), बेंगलुरू से (2484), ऋषिकेश से (189) किमी पड़ता है। आप हरिद्वार, कोटद्वार, देहरादून तक ट्रेन के जरिए भी जा सकते हैं। देहरादून तक एयर से भी जाया जा सकता है। ऋषिकेश से 215, हरिद्वार से 241, देहरादून 257, कोटद्वार से 246 किमी की दूरी पर केदारनाथ है। नईदिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, अमृतसर से सबसे अच्छी कनेक्टिविटी हरिद्वार रेलवे स्टेशन की है।
ऐसे हुई थी मंदिर की स्थापना: महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने ही गोत्र-जन की हत्या के पापा से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए पांचों पांडव भगवान शिव के दर्शन करने के लिए केदार क्षेत्र में गए, लेकिन वहां उन्हें भगवान के दर्शन न हो सके। भगवान शिव महिष यानी बैल रूप धारण करके पशुओं के झुंड में शामिल हो गए और पांडवों को दर्शन न देकर ही जाने लगे। भीम ने भगवान शिव को पहचान लिया और उन्हें पकड़ने के लिए दौड़े। भीम भगवान शिव का केवल पृष्ठभाग यानी पीठ का हिस्सा ही पकड़ सके। ऐसा होने पर पांडव बहुत दुखी हो गए और भगवान शिव की तपस्या करने लगे। पांडवों की भक्ति से खुश होकर भगवान शिव ने आकाशवाणी की और कहा कि भगवान शिव के उसी पृष्ठ भाग की शिला रूप में स्थापना करके, उसी की पूजा की जाए। भगवान शिव के उसी पृष्ठभाग की शिला को आज केदारनाथ के रूप में पूजा जाता है।
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गर्भगृह में स्थित मुख्य शिवलिंग पत्थर का बना हुआ महिषपृष्ठ के आकार का है। मंदिर में पांचों पांडवों की मूर्तियां हैं और मंदिर के बाहर शिव-पार्वती व अन्य देवी-देवताओं के चित्र हैं।
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केदारनाथ मंदिर में भगवान को कड़ा चढ़ाने की परंपरा है। शिवपुराण में दिए गए उल्लेख के अनुसार, यहां कड़ा चढ़ाने वाले व्यक्ति के सभी दुखों का नाश हो जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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यह तीर्थस्थान सर्दियों के छह महीने बन्द रहता है। इन छह माह भगवान केदारनाथ उखीमठ में रहते हैं। जब केदारनाथ के कपाट बंद किए जाते हैं तो भगवान को पालकी से यहीं लाया जाता है।
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इन 6 महीने तक भगवान भोलेनाथ का दर्शन उखीमठ में ही किया जा सकता है।
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