Published : Sep 01, 2020, 01:07 PM ISTUpdated : Nov 09, 2020, 04:45 PM IST
पटना। पूर्व लोकसभा सांसद और बिहार की राजनीति में चर्चित चेहरा समझे जाने वाले पप्पू यादव आगामी विधानसभा चुनाव को बहुत गंभीरता से ले रहे हैं। पांच साल पहले ही उन्होंने आरजेडी से निकाले जाने के बाद जन अधिकार पार्टी बना ली थी। पार्टी ने ज़ोर-शोर से 2015 का विधानसभा का चुनाव भी लड़ा, मगर एक भी सीट नहीं जीत पाई। हालांकि चुनाव में पार्टी को करीब 1.04% वोट मिले थे। वो पांच साल से पार्टी को जमाने के लिए काफी मेहनत करते दिखे हैं। अब 2020 के चुनाव के लिए भी काफी गंभीर नजर रहे हैं।
चुनाव की घोषणा से पहले बिहार में एनडीए के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उन्होंने आलोचना की है। उन्होंने विधानसभा चुनाव को लेकर भी बड़ी घोषणा की। अपनी बड़ी योजना के तहत साफ किया कि उनकी पार्टी/मोर्चा मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री का चेहरा लेकर विधानसभा के दंगल में उतरेगी। इसकी घोषणा 20 सितंबर तक कर दी जाएगी। पप्पू यादव ने यह भी साफ किया कि मुख्यमंत्री का चेहरा वो खुद नहीं होंगे।
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पप्पू यादव के दिमाग में क्या चल रहा है?
पप्पू यादव राज्य में एनडीए और महागठधन के अलावा छोटे-छोटे दलों को मिलाकर तीसरा मोर्चा भी बनाना चाहते हैं। कथित तौर पर इसके लिए वो एनडीए में शामिल लोक जनशक्ति पार्टी को भी साथ लेने ली कोशिश करते बताए गए। अन्य छोटे दलों से भी बातचीत की खबरें सामने आईं। हालांकि पप्पू यादव राज्य में तीसरे विकल्प की लगातार बात करते दिखे हैं, लेकिन इसमें कौन शामिल होगा या इसका स्वरूप क्या होगा इस बारे में साफ-साफ कुछ भी सामने नहीं आ सका है।
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क्या एलजेपी संग पका रहे खिचड़ी
कुछ चर्चाओं में चिराग पासवान का नाम भी मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर भी सामने आया। हालांकि इसे एनडीए में एलजेपी की ओर से दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा गया। कुछ भी हो, लेकिन संकेतों से ये तो साफ है कि एलजेपी बिहार चुनाव को लेकर एनडीए में अपनी भूमिका से संतुष्ट नहीं है। महादलित नेता के रूप में हिन्दुस्तानी अवामी मोर्चा के जीतनराम मांझी के आने की घटना भी एलजेपी के असंतोष को बढ़ाने वाला ही होगा।
(फोटो : चिराग और रामविलास पासवान)
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किसे बनाना चाहते हैं मुख्यमंत्री?
पप्पू यादव ने विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी स्ट्रेटजी का पूरा-पूरा खुलासा नहीं किया और यह भी नहीं बताया कि उनका मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा? मगर संकेतों में उन्होंने यह हिंट जरूर दिया कि उनकी पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री अत्यंत पिछड़ा या दलित समाज का नेता होगा। जबकि अल्पसंख्यक समुदाय से उपमुख्यमंत्री का चेहरा होगा। इस बीच जन अधिकार पार्टी चीफ ने यह भी साफ किया कि उनका विधानसभा चुनाव लड़ने का कोई इरादा नहीं है। वो अपनी भूमिका केंद्र में देख रहे हैं और वाल्मीकिनगर से उपचुनाव लड़ना चाहते हैं।
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आखिरी बार 2014 में पपू यादव ने जीता था चुनाव
बताने की जरूरत नहीं कि पप्पू यादव कई मर्तबा निर्दलीय और अलग-अलग दलों के प्रतिनिधि के रूप में लोकसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। 2015 में अच्छा काम करने वाले सांसदों में भी उनका नाम शामिल हुआ। आखिरी बार 2014 में पप्पू यादव ने लोकसभा का चुनाव आरजेडी उम्मीदवार के रूप में लड़ा था। तब उन्होंने मधेपूरा से जेडीयू के दिग्गज नेता शरद यादव को बड़े अंतर से पटखनी दी थी। बीजेपी उम्मीदवार तीसरे नंबर पर था। लेकिन 2015 में विधानसभा चुनाव से पहले जेडीयू और आरजेडी में नजदीकी बढ़ने के बाद वो हाशिये पर चले गए और उन्हें आरजेडी से बाहर जाना पड़ा।
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2019 में हार गए लोकसभा का चुनाव
फिर उन्होंने खुद की पार्टी भी बनाकर कई सीटों पर चुनाव भी लड़ा मगर कामयाबी नहीं मिली। पप्पू यादव पिछले पांच साल से बिहार में अपनी खोई राजनीतिक जमीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस बीच वो बढ़ चढ़कर सामाजिक कार्य भी करते नजर आए। 2019 में उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा मगर मधेपुरा में वो तीसरे नंबर पर चले गए। उनकी पत्नी भी चुनाव हार गईं। अब देखना है कि राजनीति में फिर से पैर जमाने की कोशिश कर रहे पप्पू यादव को कितनी कामयाबी मिलती है।
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