हेल्थ डेस्क: नॉन-वेज फ़ूड को प्रोटीन का बेहतरीन श्रोत माना जाता है। लोग चिकन और मछली प्रोटीन की जरुरत पूरी करने के लिए खाते हैं। हालाँकि, जब बर्डफ्लू आता है तो लोग चिकन की जगह मछली खाना प्रेफर करने लगते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जो मछली आपके प्लेट में सर्व की जाती है, वो भी सेफ नहीं है। हाल ही में हुए स्टडी में सामने आया है कि जिस मछली को हम खाते हैं, उसके अंदर कैडमियम जैसे केमिकल होते हैं, जो हमारी हेल्थ के लिए बिलकुल ठीक नहीं है। ये खाद्य सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करता है। ऐसे में अगर आप भी मछली खाने के शौक़ीन हैं तो हो जाएं सावधान...
हाल ही में 241 फिश फार्म पर की गई स्टडी में सामने आया कि जिस मछली को हम खाते हैं वो भी काफी अन्सेफ है। इसमें पता चला कि इन फार्मों में मिलने वाली मछलियों में खतरनाक केमिकल काफी ज्यादा मात्रा में है।
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खासकर सीसा और कैडियम की मात्रा काफी ज्यादा पाई गई। ये स्टडी दक्षिण भारत के फर्म्स पर की गई थी। तमिलनाडु के कई शहरों के मछली फर्म का पानी भी दूषित पाया गया। साथ ही बंगाल की मछलियों में सीसा काफी ज्यादा मिला।
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सीसा और कैडियम युक्त मछलियां बॉडी सेल्स को नुकसान पहुंचाती है। इन मछलियों को फ़ार्म में एंटीबायोटिक दवाइयां दी जाती है। जो उनके लिए ही नहीं, बल्कि उन्हें खाने वाले इंसानों के लिए भी अच्छी नहीं है।
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2020 में केरल की 2 हजार किलो मछलियों को मार दिया गया था। ये दूषित थी और खाने के लिहाज से खतरनाक थी। इसके अलावा दिल्ली में बिक रही मछलियां भी जहरीली थी। इन्हें खाना इंसानों के लिए खतरनाक था।
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द प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स (स्लॉटर हाउस) रूल्स, 2001 और फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (लाइसेंसिंग एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ फूड बिजनेस्स) रेगुलेशन, 2011 के हिसाब से जिस भी जानवर को काटा जा रहा है, चाहे वो चिकन हो या मछली उसे स्वस्थ रहना चाहिए।
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अगर इन जानवरों में कोई बीमारी है, तो इन्हें मार्केट में सेल नहीं करना है। लाइसेंस वाले बूचड़खानों में इसका ख्याल रखा जाता है। हालांकि, इस स्टडी में शामिल इन मछली फार्म्स में सेफ्टी मेजर का ख्याल नहीं रखा गया।
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