गैंगरेप से पहले कैसी थी निर्भया और परिवार की जिंदगी...मां ने बताया, 7 साल में बन गई हैं लड़ाका

Published : Feb 04, 2020, 03:58 PM ISTUpdated : Feb 05, 2020, 11:18 AM IST

नई दिल्ली. निर्भया गैंगरेप ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। दोषियों की विभत्सता देखकर देश के हर नागरिक ने उनके लिए मौत की मांग की। आज 7 साल से ज्यादा वक्त बीत चुका है। लेकिन निर्भया के दोषी अभी जिंदा हैं। शायद उन्हें इस साल फांसी हो जाए। लेकिन इन 7 सालों में निर्भया की मां ने जो सहा, जिन परिस्थितियों का सामना किया, उसे भुलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में बताया कि किस तरह से निर्भया के चले जाने के बाद उनकी नई जिंदगी शुरू हुई। एक आम महिला से आज ऐसी लड़ाका बन गई हैं, जो सिर्फ और सिर्फ अपनी बेटी के लिए न्याय चाहती है।  

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गैंगरेप से पहले कैसी थी निर्भया और परिवार की जिंदगी...मां ने बताया, 7 साल में बन गई हैं लड़ाका
मौत से बचने के लिए दोषियों के पास कितने विकल्प? : दोषी मुकेश और विनय की सुप्रीम कोर्ट से अर्जी खारिज होने के बाद रिव्यू, क्यूरेटिव और फिर दया याचिका खारिज हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट में रिट डालने का अधिकार हमेशा रहता है। अक्षय की रिव्यू और क्यूरेटिव खारिज हो चुकी है, लेकिन दया याचिका का विकल्प बचा हुआ है। पवन की क्यूरेटिव पिटिशन और दया याचिका दोनों ही बची है।
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निर्भया की मां बताती हैं कि 1985 में बद्रीनाथ सिंह पांडे से उनकी शादी हुई। शादी के बाद बलिया से पति-पत्नी दिल्ली चले गए। जहां उनके पति ने दिल्ली के तितारपुर इलाके में एक प्रेशर कुकर की फैक्ट्री में काम शुरू किया। 10 मई 1989 को उनकी पहली संतान निर्भया का जन्म हुआ।
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निर्भया के जन्म पर उनके पति ने 1000 रुपए की मिठाई बांटी थी। निर्भया और उसके दो भाई द्वारका के सेक्टर 8 के दो कमरों के घर में पले बढ़े।
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मां आशा देवी पांडे ने बताया कि 16 दिसंबर को निर्भया ने अपने दोस्त अवनींद्र प्रताप पांडे के साथ साकेत के सेलेक्ट सिटीवॉक मॉल में बेटी ने अपनी जिंदगी की पहली अंग्रेजी फिल्म लाइफ ऑफ पै देखी।
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मां ने बताया, 16 दिसंबर 2012 की शाम को बेटी कहकर गई थी कि वह 2-3 घंटे में वापस आ जाएगी।
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जब निर्भया की मृत्यु हुई तो उन्होंने यह तक माना था कि उन्हें इस बात का भी डर सता रहा था कि उनके पास बेटी के दाह संस्कार तक के लिए पैसे नहीं हैं। वे हिम्मत हार चुके थे।
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मां आशा देवी ने कहा, मैं बस और मेट्रो लेकर अदालत जाती हूं। गिद्धों द्वारा अपने बचाव में दिए गए तर्कों को सुन-कर घर पहुंचने तक मैं सुन्न हो जाती हूं।
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मां ने बताया, लोगों ने मुझे लड़ाका बनना सिखा दिया। उन्होंने किसी आरोपी से कभी बात नहीं की है।

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