15 साल के लड़के को नंगा करके अंग्रेज बेंत से पीटते रहे, पर वो बेहोश होने तक बोलता रहा-भारत माता की जय

Published : Feb 26, 2021, 11:59 PM IST

27 फरवरी, 1931 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान नायक चंद्रशेखर आजाद का शहीदी दिवस है। इसी दिन उन्होंने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में खुद को गोली मार ली थी, ताकि अंग्रेज उन्हें जिंदा न पकड़ सकें। अब यह पार्क चंद्रशेखर आजाद के नाम से जाना जाता है। आजाद रामप्रसाद बिस्मिल और शहीद भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथी थे। 1922 में जब महात्मा गांधी ने अचानक असहयोग आंदोलन बंद कर दिया, तब आजाद की जेहन में क्रांतिकारी विचार जन्मे। इसके बाद वे हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गए। इसी संस्था ने रामप्रसाद बिस्मिल की अगुवाई में 9 अगस्त, 1925 को काकोरी कांड किया था। यह ट्रेन डकैती थी। 1927 में बिस्मिल और 4 साथियों के बलिदान के बाद आजाद ने उत्तर भारत की क्रांतिकारी पार्टियों को मिलाकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन का गठन किया। आजाद ने भगत सिंह के साथ मिलकर लाला लाजपतराय की मौत का बदला लाहौर में 1928 को ब्रिटिश पुलिस आफिसर एसपी सांडर्स को गोली मारकर लिया। इसके बाद दिल्ली आकर असेंबली में बम फेंका। आइए जानते हैं इस महान देशभक्त की कहानी...

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15 साल के लड़के को नंगा करके अंग्रेज बेंत से पीटते रहे, पर वो बेहोश होने तक बोलता रहा-भारत माता की जय

चंद्रशेखर आजाद का जन्म मप्र के आलीराजपुर जिले के भाबरा गांव (इसे अब चंद्रशेखर आजाद नगर कहते हैं) में 23 जुलाई, 1906 को हुआ था। इनके पूर्वज यूपी के उन्नाव जिले के बदरका के रहने वाले थे। लेकिन अकाल के चलते इनके पिता सीताराम तिवारी भाबरा आकर बस गए। इनकी मां का नाम जगरानी देवी था। आजाद का बचपन भील आदिवासियों के साथ बीता। आजाद अच्छे तीरंदाज थे। भील आदिवासियों को तीरंदाजी बहुत अच्छी आती है।

( दायें इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में स्थित आजाद की प्रतिमा)

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1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने सारे देश को उद्देलित कर दिया था। आजाद तब पढ़ाई कर रहे थे। जब 1920 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन छेड़ा, तो आाजाद भी उससे जुड़ गए। वे अपने स्कूल के छात्रों के साथ रैली निकाल रहे थे, तो अंग्रेजों ने पकड़ लिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा-14-15 साल के लड़के को 15 बेंत मारने की सजा दी गई। वो अपने को आजाद कहता था। उसे नंगा किया गया और बेंत से पीटा गया। जैसे-जैसे उस पर बेंत पड़ते और उसकी चमड़ी उधेड़ती, वो भारत माता की जय चिल्लाता। वो तब तक भारत माता की जय बोलता रहा, जब तक कि बेहोश नहीं हो गया।

(आजाद का एक पुराना फोटो, दायें अल्फ्रेड पार्क में आजाद की शहादत)

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आजाद कुछ समय झांसी रहे। झांसी से करीब 15 किमी दूर ओरछा के जंगलों में वे अपने साथी क्रांतिकारियों को निशानेबाजी सिखाते थे। यहां वे पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से रहते थे। वे बच्चों को पढ़ाते। झांसी में ही रहकर उन्होंने गाड़ी चलाना सीखी।

(बायें आजाद की आजादनगर स्थित प्रतिमा)

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पंडित जवाहरलाल नेहरू की मुलाकात आनंद भवन में हुई थी। इसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा फासीवादी मनोवृत्ति में किया है। काकोरी कांड के बाद आजाद साधु के भेष में रहने लगे थे, ताकि अंग्रेज  पकड़ नहीं सकें।

(बायें आजाद की मां)

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आजाद 14 साल की उम्र में पहली बार अंग्रेजों के हाथ लगे थे, उसके बाद मरते दम तक वे आजाद रहे। 27 फरवरी, 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने आजाद को घेर लिया था। वे एक पेड़ के पीछे छुप गए। उनकी पिस्टल में एक गोली बची थी। तब उन्होंने खुद को गोली मारना उचित समझा, क्योंकि वे जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आना चाहते थे।

(आजाद की शहादत)

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