जानिए क्या है टाइम कैप्सूल, क्योंं होता है इस्तेमाल, 27 साल पहले इंदिरा ने भी इस जगह भी दफनाया था

Published : Jul 28, 2020, 08:01 AM ISTUpdated : Jul 28, 2020, 03:59 PM IST

नई दिल्ली. अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन की तैयारियां तेजी से चल रही हैं। 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत 200 मेहमान भूमि पूजन में शामिल होंगे। बताया जा रहा है कि मंदिर की नींव में 200 फीट नीचे एक टाइम कैप्सूल डाला जाएगा। इससे राम मंदिर के इतिहास को सुरक्षित रखने का प्रयास है। हालांकि, राम जन्मभूमि ट्रस्ट के एक सदस्य का कहना है कि मंदिर के नीचे टाइम कैप्सूल नहीं डाला जाएगा। हम आपको बता दें कि यह पहला मौका नहीं है, जब भारत में किसी स्थान पर टाइम कैप्सूल का इस्तेमाल हो रहा है। आईए जानते हैं कि दुनिया और भारत में इसका इस्तेमाल कब हुआ?

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जानिए क्या है टाइम कैप्सूल, क्योंं होता है इस्तेमाल, 27 साल पहले इंदिरा ने भी इस जगह भी दफनाया था

क्या है टाइम कैप्सूल?
टाइम कैप्सूल एक कंटेनर की तरह होता है। यह विशिष्ट सामग्री से बनाया जाता है। टाइम कैप्सूल काफी गहराई में दबाया जाता है। यह हर मौसम में एक जैसा बना रहता है। टाइम कैप्सूल पर किसी भी तरह का केमिकल रिएक्शन नहीं होगा। इसलिए यह कभी सड़ता-गलता नहीं है। 

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क्यों होता है इसका इस्तेमाल?
टाइम कैप्सूल के जरिए हम भविष्य में अपनी पीढ़ियों को गुजरे हुए कल के बारे में बता सकते हैं। टाइम कैप्सूल को दबाने का मकसद होता है कि किसी समाज, देश के इतिहास को सुरक्षित रखकर उसके बारे में आगे की पीढ़ी को बताया जा सके। इससे भविष्य की पीढ़ी को किसी खास युग, समाज और देश के बारे में जानने में काफी मदद मिलती है।

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1973 में लालकिले के नीचे इंदिरा ने डाला था टाइम कैप्सूल 
भारत में राम मंदिर से पहले भी टाइम कैप्सूल का इस्तेमाल होता रहा है। 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हो. लाल किले के 32 फीट नीचे अपने हाथ से टाइम कैप्सूल डाला था। बताया जाता है कि उस कैप्सूल में आजादी के 25 सालों का घटनाक्रम के साक्ष्य हैं। इंदिरा ने ने इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च को इन घटनाओं के साक्ष्य इकट्ठे काम करने का जिम्मा सौंपा था। हालांकि, उस समय काफी विवाद हुआ था। विपक्ष का आरोप था कि इंदिरा ने इसके जरिए अपना और अपने परिवार का महिमामंडन किया है। 

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भारत में और कहां हुआ इस्तेमाल  
आईआईटी कानपुर ने 2010 में अपने 50 साल पूरे होने के मौके पर टाइम कैप्सूल को जमीन के अंदर दबाया था। इसे तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने जमीन के अंदर डाला था। इसका उद्देश्य था कि भले ही दुनिया तबाह हो जाए लेकिन आईआईटी कानपुर का इतिहास सुरक्षित रहे। इसके अलावा कानपुर के अलावा चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय में भी टाइम कैप्सूल दफनाया गया है।

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मोदी पर भी लगे थे आरोप
2011 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो विपक्ष ने उन पर भी टाइम कैप्सूल दफनाने का आरोप लगाया था। विपक्ष का दावा था कि गांधीनगर में निर्मित महात्मा मंदिर के नीचे टाइम कैप्सूल डाला गया है। इसमें मोदी ने अपनी उपलब्धियों का बखान किया है। 

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इसे माना जाता है दुनिया का पहला टाइम कैप्सूल 
टाइम कैप्सूल का अतीत सैकड़ों साल पुराना है। स्पेन के बर्गोस में 2017 करीब 400 साल पुराना टाइम कैप्सूल मिला था। यह ईसा मसीह की मूर्ति के रूप में था। मूर्ति के अंदर एक दस्तावेज भी था। इसमें 1777 के आसपास की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सूचनाएं थीं। अभी इसे ही दुनिया का सबसे पुराना टाइम कैप्सूल माना जाता है। 

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