खुशियों की अंतिम तैयारी, चंद दूरी पर है दिवाली

Published : Oct 23, 2019, 11:18 AM ISTUpdated : Oct 23, 2019, 11:23 AM IST

दिवाली को खुशियों का त्यौहार कहा जाता है। क्योंकि यह त्यौहार सबको हर्ष-उल्लास में डूबने का मौका देता है। बाजार में रौनक होती है, लोगों के काम-काज में चार-चांद लगते हैं।  इस बार दिवाली 27 अक्टूबर को मनाई जाएगी। वैसे दिवाली के त्योहार का आगाज धनतेरस से शुरू हो जाता है। धनतेरस 25 अक्टूबर को है। इस दिन से घरों और बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। यह पांच दिवसीय त्योहार 29 अक्टूबर को भाई दूज के साथ विदा लेगा। करीब 50 साल बाद ऐसा संयोग आ रहा है, जब दिवाली के दिन ही नरक चतुर्दशी पड़ रही है। खैर, यह तो हुई दिवाली के बारे में छोटी-सी बात। लेकिन यह याद रखें कि किसी भी त्योहार को मनाने के पीछे उसकी एक सामाजिक सोच भी होती है। त्योहार इसलिए मनाए जाते हैं, ताकि लोग एक-दूसरे को खुशियां बांटें। बाजार से लोग खरीददारी करें, ताकि लोगों का रोजगार बढ़े। पिछले कुछ सालों से इलेक्ट्रिक लाइट्स यानी चाइनीज झालर का प्रचलन बढ़ा है। लेकिन असली दिवाली दीयों से ही जगमग होती है। गरीब कुम्हार सालभर दिवाली का इंतजार करते हैं, ताकि उनके हुनर से तैयार दीये बिकें और वे भी दिवाली के त्योहार में अपने लिए कुछ खुशियां खरीद सकें। इसलिए रोशनी करने अगर दीये खरीदेंगे, तो इनकी भी दिवाली मन जाएगी। इन्हें भी खुशियां हासिल करने का मौका मिल जाएगा। पटाखों से भी कई परिवारों का घर चलता है। 

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खुशियों की अंतिम तैयारी, चंद दूरी पर है दिवाली
यह तस्वीर राजस्थान की है। एक कुम्हार अपने काम में किस तरह डूबा हुआ है, साफ देखा जा सकता है। एक समय था, जब दीये जलाकर ही घर रोशन किया जाता था, लेकिन जब से इलेक्ट्रिक लाइट्स का प्रचलन बढ़ा है, कुम्हारों की आजीविका पर संकट खड़ा हो गया है।
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दिवाली पर दीयों के अलावा अन्य मिट्टी के बर्तनों आदि का भी इस्तेमाल होता रहा है। कुम्हार जाति को सिर्फ मजदूर नहीं माना जाता। वे माटी के कलाकार होते हैं। माटी को अपने हुनर से किस्म-किस्म का रूप दे देते हैं।
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दीयों को अंतिम रूप देती एक कुम्हार महिला। असली दिवाली दीये जलाने पर ही मनती है। कोशिश करें कि फिर से असली दिवाली पर लौटें। घरों में दीये रोशन करें। दीये खरीदकर कुम्हारों के घरों में भी खुशियां आने दें।
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दीयों को कलर करता एक कुम्हार। यह तस्वीर पंजाब के जालंधर की है। धार्मिक मान्यता है कि जब भगवान राम वनवास से वापस अयोध्या लौटे थे, तब दीये जलाकर ही रोशनी की गई थी। जश्न मनाया गया था। सारी परंपराएं सामाजिक उद्देश्य से जोड़कर बनाई गई हैं। ये लोगों की आर्थिक और सामाजिक हैसियत में वृद्धि करती हैं।
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दीयों की रोशनी प्राकृतिक रूप से भी अच्छी होती है। यह प्रदूषण नहीं फैलाती। यानी मिट्टी के दीये नष्ट होने पर फिर से मिट्टी बन जाते हैं।
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यह तस्वीर तमिलनाडु की है। एक महिला पटाखे तैयार करते हुए। दिवाली हो और पटाखे न फोड़े जाएं, ऐसा हो ही नहीं सकता। पटाखों का कारोबार भी कई परिवारों के पेट पालता है।

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