कानपुर एनकाउंटरः जान बचाने थाने के लॉकअप में छिपे थे बीजेपी के मंत्री, विकास दुबे ने बाहर खींचकर मारी थी गोली

Published : Jul 03, 2020, 02:30 PM IST

कानपुर(Uttar Pradesh).  यूपी के कानपुर में दबिश देने गई पुलिस टीम पर हमला कर 8 पुलिसकर्मियों को शहीद करने वाले हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे का पुराना आपराधिक इतिहास रहा है। बचपन से ही वह जरायम की दुनिया में अपना नाम बनाना चाहता था। पहले उसने गैंग बनाया और लूट, डकैती, हत्याएं करने लगा। विकास दुबे तब पूरे प्रदेश में चर्चा में आया था जब उसने 19 साल पहले थाने में घुसकर बीजेपी के दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की हत्या की थी। संतोष शुक्ला की हत्या ने विकास को जरायम की दुनिया में बड़ी पहचान दिलाई। हांलाकि वह इस हत्या से इसलिए बरी हो गया क्योंकि उसके खिलाफ किसी ने गवाही ही नहीं दी। हत्या के ही एक अन्य मामले में उसे उम्रकैद भी हुई थी लेकिन वह जमानत पर बाहर आ गया था ।  

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कानपुर एनकाउंटरः जान बचाने थाने के लॉकअप में छिपे थे बीजेपी के मंत्री, विकास दुबे ने बाहर खींचकर मारी थी गोली

1996 के विधानसभा चुनाव के दौरान चौबेपुर विधानसभा सीट से हरिकृष्ण श्रीवास्तव और भाजपा के संतोष शुक्ला के बीच तगड़ा मुकाबला हुआ। विकास दुबे ने अपने क्षेत्र के लोगों से श्रीवास्तव को जिताने का फरमान जारी कर दिया। इस दौरान संतोष शुक्ला और विकास के बीच कहासुनी हुई। इलेक्शन हरिकृष्ण श्रीवास्तव जीत गए।

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विकास अपने गुर्गों के साथ हरिकृष्ण श्रीवास्तव की जीत का जश्न मना रहा था। इसी दौरान संतोष शुक्ला भी वहां से गुजर रहे थे। विकास ने उनकी कार को रोक कर गाली-गलौज शुरू कर दी। दोनों तरफ से जमकर हाथा-पाई हुई। इसी के बाद से विकास ने संतोष शुक्ला को खत्म करने की ठान ली। पांच साल तक संतोष शुक्ला और विकास के बीच जंग जारी रही।
 

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2001 में यूपी में भाजपा सरकार बनी तो संतोष शुक्ला को दर्जा प्राप्त मंत्री बनाया गया। इसी के बाद से विकास दुबे की उल्टी गिनती शुरू हो गई। संतोष शुक्ला की प्रशासनिक पैठ विकास को अखरने लगी। वह मन ही मन में संतोष को जान से मारने का प्लान बनाने लगा।

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2001 में संतोष शुक्ला एक सभा को संबोधित कर रहे थे, तभी विकास अपने गुर्गों के साथा आ धमका और संतोष शुक्ला पर फायरिंग शुरू कर दी। संतोष जान बचाने के लिए पास ही स्थित शिवली थाने पहुंचे और खुद को लॉकअप में बंद कर लिया, लेकिन विकास वहां भी पहुंच गया और लॉकप से बाहर निकालकर संतोष को मौत के घाट उतार दिया।
 

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2002 के वक्त तब मायावती सूबे की सीएम थीं, तब कानपुर के कुछ स्थानीय बसपा नेताओं से इसका अच्छा संबंध था। इसके कारण इसका सिक्का बिल्हौर, शिवराजपुर, रनियां, चौबेपुर के साथ ही कानपुर नगर में चलता था। इस दौरान इसने जमीनों पर अवैध कब्जे के साथ अन्य गैर कानूनी तरीके से करोड़ो की संपत्ति बनाई। जेल में रहने के दौरान शिवराजपुर से नगर पंचयात अध्यक्ष का चुनाव जीत गया। 

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