क्या सच में शिवजी के 'हनुमान अंश' हैं बजरंगबली? जानिए 11वें रुद्र अवतार का पौराणिक रहस्य

Published : Sep 03, 2026, 07:00 AM IST
Hanuman Ji and Lord Shiva

सार

क्या हनुमान जी सच में शिव के 11वें रुद्र अवतार हैं? फिल्म 'हनुमान अंश' की चर्चा के बीच जानिए शिव पुराण का वह रहस्य, जिसने महादेव को वानर रूप में धरती पर भेजा।

Hanuman Ji and Lord Shiva Connection: नीम करोली बाबा पर बनी फिल्म 'हनुमान अंश' इन दिनों खूब चर्चा में है। कम बजट वाली इस फिल्म के आने के बाद से लोगों के मन में हनुमान जी से जुड़े किस्सों को जानने की दिलचस्पी और ज्यादा बढ़ गई है। हम सभी बचपन से ही सुनते आ रहे हैं कि बजरंगबली भगवान शिव के ही अंश हैं। लेकिन क्या सच में हनुमान जी और शिवजी एक ही हैं? शिव पुराण, वाल्मीकि रामायण और कई प्राचीन ग्रंथों में उन्हें शिव का रुद्र रूप बताया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस मान्यता के पीछे क्या कहानी है और उन्हें 'रुद्र' से जोड़ने वाली मान्यता कहां से आई? आइए जानते हैं पौराणिक रहस्य...

रुद्र कौन हैं?

भगवान शिव के कई नामों में एक नाम रुद्र भी है। रुद्र का संबंध शिव के उस रूप से माना जाता है, जो शक्ति, तेज और बदलाव का प्रतीक है। धार्मिक परंपराओं में रुद्र के कई रूपों का वर्णन मिलता है। इसी वजह से जब हनुमान जी को 11वां रुद्र कहा जाता है और माना जाता है कि उनमें भगवान शिव की शक्ति और तेज का अंश मौजूद था।

शिवजी को हनुमान अवतार क्यों लेना पड़ा?

पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु और भगवान शिव का संबंध हमेशा से एक-दूसरे के पूरक का रहा है। जब विष्णु जी ने त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के रूप में मानव जन्म लिया, तब महादेव ने तय किया कि वे भी अपने आराध्य की सेवा के लिए धरती पर मौजूद रहेंगे। शिवजी के हनुमान अवतार लेने के पीछे 3 बड़ी वजहें बताई जाती हैं...

सेवक भाव की मिसाल: शिवजी जगत के स्वामी हैं, लेकिन वे रामजी की सेवा एक अनन्य भक्त बनकर करना चाहते थे।

अमरता का वरदान: रावण को हराने के लिए ऐसी शक्ति चाहिए थी जिसे कोई अस्त्र-शस्त्र न भेद सके। इसलिए शिवजी के तेज से हनुमान जी का प्राकट्य हुआ।

दुष्टों का संहार: रावण को ब्रह्मा जी का वरदान था कि कोई देव, दानव या यक्ष उसे मार नहीं सकेगा। उसने वानरों को तुच्छ समझा था, इसलिए महादेव ने वानर रूप चुना।

पवनदेव के जरिए कैसे पहुंचा शिवजी का तेज?

शिव पुराण की कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के समय मोहिनी रूप धरा था, तब उस दिव्य रूप को देखकर महादेव का तेज स्खलित हुआ। सप्तर्षियों ने उस तेज को संग्रहित कर लिया। सही समय आने पर पवनदेव ने उस महातेज को वानर राज केसरी की पत्नी माता अंजना के गर्भ में स्थापित कर दिया। इसके बाद हनुमान जी का जन्म अंजना और केसरी के घर हुआ माना जाता है। यही कारण है कि उन्हें पवनपुत्र भी कहा जाता है।

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