
वैज्ञानिकों ने एक नया कमाल कर दिखाया है। उन्होंने पहली बार स्पेस में किसी इंसान और उपकरण का एक्स-रे लिया है। यह एक ऐसी सफलता है जो चांद और उससे भी आगे के लंबे इंसानी मिशनों की तैयारी में बहुत बड़ी मदद करेगी। इस छोटी और पोर्टेबल एक्स-रे टेक्नोलॉजी का टेस्ट पूरी तरह कामयाब रहा है। इस नई खोज के बारे में 'रेडियोलॉजी' नाम के साइंस जर्नल में छापा गया है। यह टेक्नोलॉजी न सिर्फ स्पेस में एस्ट्रोनॉट्स की सेहत का ख्याल रखेगी, बल्कि धरती पर दूर-दराज के गांवों में इलाज के तरीकों को भी बदल सकती है।
अब तक स्पेस में एस्ट्रोनॉट्स की हेल्थ जांच के लिए मुख्य रूप से अल्ट्रासाउंड पर ही निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन अल्ट्रासाउंड की अपनी सीमाएं हैं, क्योंकि इसकी साउंड वेव को गुजरने के लिए एक मीडियम की जरूरत होती है। वहीं, एक्स-रे वैक्यूम यानी बिना हवा वाली जगह में भी काम कर सकता है और गंभीर चोटों का पता लगाने में ज़्यादा कारगर है। पहले की एक्स-रे मशीनें बहुत बड़ी होती थीं और उन्हें बहुत ज़्यादा बिजली की ज़रूरत पड़ती थी। साथ ही, लॉन्च के दौरान होने वाले तेज झटकों से उनके खराब होने का डर भी था। लेकिन टेक्नोलॉजी में हुई तरक्की के साथ अब छोटी और हाथ में लेकर चलने लायक एक्स-रे मशीनें बना ली गई हैं।
इस कमाल की टेक्नोलॉजी को 31 मार्च, 2025 को लॉन्च हुए एक प्राइवेट स्पेस मिशन Fram2 में टेस्ट किया गया। यह मिशन स्पेसएक्स (SpaceX) के क्रू ड्रैगन (Crew Dragon) स्पेसक्राफ्ट में पूरा किया गया। चार लोगों की टीम ने यह टेस्ट किया, जो मेडिकल एक्सपर्ट नहीं थे। उन्हें लॉन्च से पहले सिर्फ चार घंटे की ट्रेनिंग दी गई थी। इसके बाद, उन्होंने ऑर्बिट में रहते हुए अपने हाथ, पेट, कमर और छाती के एक्स-रे लिए। धरती पर तीन अलग-अलग मेडिकल एक्सपर्ट्स ने इन तस्वीरों को जांचा। हालांकि धरती पर लिए गए एक्स-रे की क्वालिटी बेहतर थी, लेकिन स्पेस में ली गई तस्वीरें भी हड्डी टूटने जैसी चोटों का पता लगाने के लिए काफी अच्छी थीं।
भविष्य में जब इंसान चांद और मंगल पर लंबे मिशन के लिए जाएगा, तो धरती से तुरंत मेडिकल मदद मिलना मुश्किल होगा। ऐसे में एस्ट्रोनॉट्स के लिए खुद अपनी जांच करने वाले उपकरण बहुत ज़रूरी हो जाएंगे। यह एक्स-रे टेक्नोलॉजी सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि स्पेस में मशीनों की खराबी का पता लगाने में भी काम आएगी। स्पेस सूट, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और सैटेलाइट की जांच के लिए भी इसका इस्तेमाल हो सकता है। भविष्य में इसे चांद पर चलने वाले रोवर्स में लगाकर सतह की स्टडी भी की जा सकती है।
रिसर्चर्स को उम्मीद है कि स्पेस में टेस्ट की गई यह छोटी एक्स-रे मशीन धरती पर हेल्थकेयर सेक्टर में भी क्रांति ला सकती है। बड़े अस्पतालों से दूर, गांवों और आपदा प्रभावित इलाकों में यह मशीन बीमारी का जल्दी पता लगाने में मदद करेगी। ये डिवाइस सोलर पावर से भी चल सकते हैं और इन्हें चलाने के लिए बहुत ज़्यादा ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं है। रिसर्चर्स का मानना है कि यह ग्लोबल पब्लिक हेल्थ के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।