
Fast Track Court in India: देश में नीट (NEET) समेत कई प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक के मामलों को लेकर माहौल गर्म है। छात्रों का गुस्सा, विपक्ष के तीखे हमले और जंतर-मंतर से लेकर देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा ऐलान किया है। पीएम मोदी ने स्पष्ट किया है कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले पेपर माफियाओं को बख्शा नहीं जाएगा और इसके लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Courts) बनाए जाएंगे। देश में पहली बार पेपर लीक जैसे मुकदमों के लिए अलग से फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन होने जा रहा है। ऐसे में हर किसी के मन में सवाल है कि आखिर यह फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या होता है, इसमें फैसला कितनी जल्दी आता है और इससे अपराधियों पर कैसे नकेल कसेगी? आइए जानते हैं जवाब...
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पेपर लीक करने वालों को किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जाएगा। उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों की सुनवाई तेजी से कराने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे। उनके मुताबिक, इसका मकसद छात्रों का भविष्य सुरक्षित करना और दोषियों को जल्द से जल्द सजा दिलाना है। सरकार ने संबंधित विभागों को जरूरी कार्रवाई के निर्देश भी दिए हैं।
Nothing is more important than the welfare and future of our youth!
We have decided to set up fast-track courts to ensure swift and stringent punishment for those involved in paper leaks. Have directed the concerned authorities and officials to take all necessary steps in this…— Narendra Modi (@narendramodi) July 23, 2026
'फास्ट ट्रैक' यानी तेजी से काम करने वाली अदालत। यह कोई बिल्कुल अलग बिल्डिंग या अलग ढांचा नहीं होती, बल्कि राज्य सरकारें हाईकोर्ट के परामर्श से मौजूदा अदालतों जैसे सेशन कोर्ट में से ही कुछ को विशेष मुकदमों की जिम्मेदारी सौंप देती हैं। इन कोर्ट में ऐसे मामलों की सुनवाई होती है, जिन्हें जल्दी निपटाना जरूरी माना जाता है। इसलिए यहां केस को प्रॉयरिटी दी जाती है और बार-बार तारीख मिलने की संभावना सामान्य अदालतों के मुकाबले कम होती है। इसका मुख्य मकसद अदालतों में सालों-साल खिंचने वाले संवेदनशील और गंभीर मामलों का जल्द से जल्द निपटारा करना है।
भारत में पहली बार सन 2000 में 11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की शुरुआत हुई थी। इस समय देशभर में 860 से भी ज्यादा फास्ट ट्रैक कोर्ट अलग-अलग गंभीर मामलों की सुनवाई कर रहे हैं।
हर केस का समय उसके सबूत, गवाह और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करता है, इसलिए कोई एक तय समय सभी मामलों पर लागू नहीं होता है। हालांकि, फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य आमतौर पर 6 महीने या एक निर्धारित डेडलाइन के भीतर सुनवाई पूरी करके अंतिम फैसला सुनाना होता है। ऐसे कोर्ट में मामलों की सुनवाई टालने की अनुमति कम मिलती है और कई बार डे-टू-डे (रोजाना) आधार पर गवाही दर्ज की जाती है। मुकदमों को बिना किसी रुकावट के तेजी से निपटाने के लिए इनमें सीनियर या अनुभवी जजों को तैनात किया जाता है।
| सामान्य कोर्ट | फास्ट ट्रैक कोर्ट |
|---|---|
| मामलों की संख्या बहुत ज्यादा होती है | चुनिंदा मामलों की सुनवाई होती है |
| तारीखें ज्यादा पड़ सकती हैं | सुनवाई तेज गति से होती है |
| फैसला आने में कई बार साल लग जाते हैं | कम समय में फैसला देने की कोशिश होती है |
केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, दुष्कर्म और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों (POCSO) से जुड़े फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 2019 से 2025 के बीच 3.06 लाख से ज्यादा मामलों का फैसला सुनाया। इन स्पेशल कोर्ट्स में मुकदमों के निपटाने की दर 96.28% रही है, यानी जितने नए केस दर्ज हुए, लगभग उतने ही केस निपटा भी दिए गए। इसी सफलता को देखते हुए अब पेपर लीक और फर्जीवाड़े के मामलों को भी फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने की तैयारी है, ताकि आरोपियों को तुरंत जेल भेजा जा सके।
फास्ट ट्रैक कोर्ट से फैसला आने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी के सारे कानूनी रास्ते बंद हो गए हैं। अगर किसी पक्ष (पीड़ित या आरोपी) को फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले से आपत्ति है, तो वह नियमानुसार तय समय के अंदर हाईकोर्ट (High Court) और फिर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में अपील कर सकता है।