
Why Touch Elders Feet: भारतीय संस्कृति में बड़ों का सम्मान करना महत्वपूर्ण संस्कारों में से एक है। इसी सम्मान को दिखाने की एक परंपरा है बड़ों के पैर छूना या चरण स्पर्श करना। घर में माता-पिता, दादा-दादी, गुरु और बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लेने की परंपरा है। सवाल उठता है बड़ों का पैर क्यों छुआ जाता है? इसके पीछे क्या महत्व है? आइए जानते हैं।
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चरण स्पर्श का मतलब है किसी सम्मानित व्यक्ति के पैरों को छूकर उनका आशीर्वाद लेना। पैर छूना सिर्फ एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि विनम्रता, श्रद्धा और संस्कार का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है जब कोई व्यक्ति अपने से बड़े और सम्मानित व्यक्ति के सामने झुकता है, तो उसके अंदर अहंकार कम होता है और वह ज्ञान और आशीर्वाद पाता है।
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सनातन धर्म में माता-पिता, गुरु और बुजुर्गों को खास सम्मान दिया गया है। बुजुर्गों के अनुभव और आशीर्वाद में एक पॉजिटिव पावर होती है। इसलिए उनके चरण स्पर्श करके इंसान उनके प्रति सम्मान प्रकट करता है और जीवन में सुख, सफलता और सद्बुद्धि की कामना करता है। इसी वजह से त्योहारों, शादी-विवाह, पूजा और शुभ कामों के समय अपने से बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है।
हिंदू धर्म में माता-पिता को भगवान के समान माना गया है। कहा गया है -
मातृ देवो भव, पितृ देवो भव
अर्थ- माता और पिता को देवता के समान मानना चाहिए। माता-पिता के पैर छूने से उनका आशीर्वाद मिलता होता है और जीवन में खुशहाली आती है।
गुरु को ज्ञान देने वाला मार्गदर्शक माना गया है। पुराने समय में छात्र पढ़ाई शुरू करने से पहले गुरु के पैर छूते थे। इसका मकसद था- छात्र अपने अंदर विनम्रता रखें और गुरु के ज्ञान को श्रद्धा से ग्रहण करें। भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपने गुरु सांदीपनि ऋषि से शिक्षा हासिल की थी।
रामायण में भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है। श्रीराम हमेशा अपने माता-पिता, गुरु और बुजुर्गों का सम्मान करते थे। जब भी वे किसी बड़े व्यक्ति से मिलते थे, तो उनका सम्मान करते थे और उनका आशीर्वाद लेते थे।
महाभारत में भी पांडवों द्वारा बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करने के कई उदाहरण मिलते हैं। युद्ध से पहले अर्जुन और अन्य पांडवों ने भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और अन्य बुजुर्गों का आर्शीवाद लिया था। इससे यह सीख मिलती है, किसी प्रकार के मनुमुटाव या मतभेद होने पर भी अपने संस्कार नहीं भूलने चाहिए।
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, मथुरा पहुंचने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपने माता-पिता वसुदेव और देवकी को प्रणाम किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपने गुरु सांदीपनि मुनि के चरणों में झुककर उनका आर्शीवाद लिया।
रामचरितमानस के अयोध्याकांड में भरत, चित्रकूट जाकर श्रीराम के चरणों में गिरकर उनसे अयोध्या लौटने की प्रार्थना करते हैं। इसका मतलब है - पैर छूना सिर्फ उम्र का नहीं, बल्कि आदर्श और श्रेष्ठता का भी सम्मान है।
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥
अर्थ- जो इंसान हर दिन बड़ों का सम्मान करता है, पैर छूनकर उनका आर्शीवाद लेता है, उनकी सेवा करता है, ऐसे लोगों की उम्र, ज्ञान, यश और बल में इजाफा होता है।