
नई दिल्ली. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान दक्षिण भारत की रानी चेन्नम्मा ने जिस बहादुरी से अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लिया, वह इतिहास के पन्नों में दर्ज है। पति की असामयिक मृत्यु के बाद रानी चेन्नम्मा ने राजकाज संभाला और अंग्रेजों के खिलाफ अभियान जारी रखा।
कौन थीं रानी चेन्नम्मा
उनका जन्म 1778 में वर्तमान बेलगावी जिले के काकाती नामक छोटे से गांव में एक लिंगायत परिवार में हुआ था। वर्तमान में इसे उत्तरी कर्नाटक में बेलगाम के नाम से जाना जाता है। वह बचपन से ही घुड़सवारी, तलवारबाजी और तीरंदाजी में माहिर हो गई थीं। चेन्नम्मा की शादी देसाई राजकुमार मल्ला सरजा से हुई थी। पति की असामयिक मृत्यु के बाद चेन्नम्मा अपने दत्तक पुत्र शिवलिंगप्पा को राजा बनाना चाहती थी। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना अधिकार जमाया और विरोध किया। इसके बाद चेन्नम्मा ने कंपनी के आदेश का विरोध किया और कोई भी निर्देश मानने से इनकार कर दिया। जिसके बाद दोनों के बीच युद्ध भी हुआ।
अंग्रेजी सेना पर किया हमला
1824 में चेन्नम्मा की सेना द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना पर हमला कर दिया गया। इस लड़ाई में कंपनी सेना के प्रमुख सर जॉन की गोली मारकर हत्या कर उन् गई। दो ब्रिटिश अधिकारियों को बंधक बना लिया गया। इस हमले ने ईस्ट इंडिया कंपनी को झकझोर कर रख दिया। कंपनी को अपने अधिकारी छुड़ाने के लिए युद्धविराम करना पड़ा। यह एक तरह से अंग्रेजों की हार के समान था। चेन्नम्मा ने अंग्रेजों का प्रस्ताव माना और बंधकों को छोड़ दिया। लेकिन अंग्रेजों ने फिर बदला लिया और कित्तूर पर हमले के लिए बड़ी सेना भेजी। उस भीषण युद्ध में रानी चेन्नम्मा को पकड़ लिया गया। उन्हें किले में कैद कर दिया गया। रानी के सेनापति संगोली रायन्ना को भी पकड़ लिया गया और फांसी पर लटका दिया गया। उनके दत्तक पुत्र को भी गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में अंग्रेजों की कैद में ही रानी चेन्नम्मा की मृत्यु हो गई।
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