
नई दिल्ली. भारत की आजादी में महिला क्रांतिकारियों की भी बड़ी भूमिका रही है। हम सभी क्रांति की उन बड़ी घटनाओं को जानते हैं, जिसमें उस समय के बड़े नेता शामिल थे। लेकिन कई संघर्ष ऐसे भी थे, जिन्हें ज्यादा लोग नहीं जानते। ऐसी कई कहानियां हैं जिसमें महिला क्रांतिकारियों ने संघर्ष किया और अंग्रेजों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। ऐसी ही वीर गृहिणी थीं असम के बेहरामपुर की भोगेश्वरी फुकानानी। वह आठ बच्चों की मां थीं।
स्वतंत्रता संग्राम में अधिक महिलाओं को शामिल करना महात्मा गांधी का निर्णय था। महिलाओं में अधिक धैर्य और सहनशीलता इसकी वजह थी। इस वजह से देश भर की महिलाएं बड़े पैमाने पर स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित हुईं। असम में भारत छोड़ो संघर्ष में कई बहादुर महिलाएं सामने आईं। जिनमें भोगेश्वरी, कनकलता बरुआ, खाहुली नाथ, तिलेश्वरी बरुआ और कुमाली नियोग का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। तीनों महिलाएं उस संघर्ष के दौरान शहीद हो गईं जिसमें गांधी ने स्पष्ट आह्वान किया था करो या मरो।
कौन थीं भोगेश्वरी
भोगेश्वरी 60 वर्ष की थीं जब उन्होंने सितंबर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया। अंग्रेजों ने इस संघर्ष को कुचलने की कोशिश की। बेहरामपुर में ब्रिटिश पुलिस वहां के कांग्रेस कार्यालय पर कब्जा करने पहुंची थी। इसका प्रबल विरोध किया गया। इसी दौरान कैप्टन फिनिश के नेतृत्व में सेना की बड़ी टुकड़ी मौके पर पहुंची। अंग्रेजों ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हमला बोल दिया। तब भोगेश्वरी अपनी साथी रत्नमाला के साथ तिरंगा झंडा लेकर आगे बढ़ीं। कैप्टन ने रत्नमाला के हाथ से झंडा छीनकर तोड़ने की कोशिश की। तभी भोगेश्वरी ने अंग्रेज अधिकारी पर हमला बोल दिया और डंडे से वार किया। घबराकर कैप्टन ने भोगेश्वरी को गोली मार दी। वह मौके पर ही शहीद हो गईं।
कनकलता बरूआ का संघर्ष
उसी दिन 17 वर्षीय कनकलता बरुआ के नेतृत्व में आत्मघाती दस्ते ने पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया और तिरंगा फहराने की कोशिश की। पुलिस ने उसी दौरान गोली मार दी। असम में वीर बाला के नाम से मशहूर कनकलता की बहादुरी के चर्चे रहे। बाद में तेजपुर के एक उद्यान में उनकी प्रतिमा लगाई गई। 2011 में गौरीपुरा में उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया था। भारतीय तटरक्षक बल के तेज वेसल आईसीजीएस का नाम कनकलता बरूआ है।
खाहुली नाथ का संघर्ष
दमदमिया गांव में थाने पर कब्जा करने के लिए पहुंचे आत्मघाती दस्ते का नेतृत्व खाहुली नाथ कर रही थीं। अपने पति पोनराम नाथ के साथ उन्होंने खाहुली ने भारी पुलिस बल की परवाह किए बिना रैली निकाल। जैसे ही तिरंगा झंडा फहराने की कोशिश की गई, पुलिस ने गोली चला दी। जिसमें खाहुली की मौत हो गई। उसी दौरान 12 वर्षीय तिलेश्वरी बरूआ और 18 वर्षीय कुमाली नियोग जैसी महिलाएं भी शहीद हो गईं।
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