Aaj Ka Panchang 6 मई 2022 का पंचांग: आज बनेंगे पद्म और लुंबक नाम के योग, ये रहेगा राहुकाल का समय

Published : May 06, 2022, 03:42 PM IST
Aaj Ka Panchang 6 मई 2022 का पंचांग: आज बनेंगे पद्म और लुंबक नाम के योग, ये रहेगा राहुकाल का समय

सार

6 मई 2022, दिन शुक्रवार को वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि है। इस दिन आदि शंकराचार्य और संत सूरदास की जयंती मनाई जाएगी।

उज्जैन. हिंदू धर्म में अक्सर पंचांग शब्द का उपयोग किया जाता है। ये बात तो सभी जानते हैं पंचांग से ही शुभ मुहूर्त व राहुकाल आदि का निर्धारण किया जाता है, मगर बहुत कम जानते हैं कि पंचांग आखिर होता क्या और ये किस तरह से काम करता है। वैसे तो हमारे देश में कई तरह के पंचांग प्रचलित है, लेकिन उन सभी में विक्रम पंचांग सबसे विश्वसनीय और प्रमुख है। ग्रहों की स्थिति, दूरी और गति के मान से ही पृथ्वी पर होने वाले दिन-रात और अन्य संधिकाल को विभाजित कर एक पूर्ण सटीक पंचांग बनाया जाता है। पंचांग वैदिक काल से ही सनातन धर्म में काल गणना का एक प्रमुख अंग रहा है। अगर कहा जाए कि पंचांग एक प्राचीन हिंदू कैलेंडर है तो गलत नहीं होगा। आगे जानिए 6 मई का पंचांग और इससे जुड़ी खास बातें…

ऐसे तैयार किया जाता है पंचांग… ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पंचांग मुख्य रूप से 5 अंगों से मिलकर बनता है ये हैं करण, तिथि, नक्षत्र, वार और योग। जानिए इन पांच से जुड़ी खास बातें…

करण:  ज्योतिषियों के मुताबिक तिथि का आधा भाग करण कहलाता है। कुल 11 करण होते हैं- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न। 

तिथि: चन्द्र रेखांक को सूर्य रेखांक से 12 अंश ऊपर जाने के लिए जो समय लगता है, वह तिथि कहलाती है। तिथि कुल 16 होती है प्रतिपदा से चतुर्दशी तक 14 और पूर्णिमा व अमावस्या।

नक्षत्र: आकाश में दिखाई देने वाले तारों के समूह को नक्षत्र कहा जाता है। इसमें 27 नक्षत्र होते हैं। नक्षत्रों का राजा पुष्य का कहा जाता है।

वार: एक सप्ताह में सात वार होते हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं- सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार। ये सभी अलग-अलग देवताओं से संबंधित होते हैं।

योग: नक्षत्र की ही तरह योग भी 27 प्रकार के होते हैं। कुछ योग शुभ होते हैं और कुछ अशुभ।

6 मई का पंचांग (Aaj Ka Panchang 6 May 2022)
6 मई 2022, दिन शुक्रवार को वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि है। इस दिन आदि शंकराचार्य और संत सूरदास की जयंती मनाई जाएगी। इस दिन सूर्योदय आर्द्रा नक्षत्र में होगा, जो सुबह 6.49 तक रहेगा, इसके बाद पुनर्वसु नक्षत्र पूरे दिन रहेगा। शुक्रवार को पहले आर्द्रा नक्षत्र होने से पद्म नाम का शुभ योग और इसके बाद पुनर्वसु नक्षत्र होने से लुंबक नाम का अशुभ योग इस दिन बन रहा है। इस दिन राहुकाल सुबह 10:46 से दोपहर 12:23 तक रहेगा। इस दौरान शुभ काम करने से बचें।

ग्रहों की स्थिति कुछ इस प्रकार से होगी...
6 मई, शुक्रवार को शुक्र और गुरु मीन राशि में, बुध ग्रह वृषभ राशि में, सूर्य और राहु मेष राशि में, केतु तुला राशि में और मंगल कुंभ राशि में, चंद्रमा मिथुन राशि में, शनि कुंभ राशि में रहेगा। शुक्रवार को पश्चिम दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए। अगर यात्रा करना जरूरी हो तो जौ या राईं खाकर घर से बाहर निकलें।

6 मई के पंचांग से जुड़ी अन्य खास बातें
विक्रमी संवत: 2079
मास पूर्णिमांत: वैशाख
पक्ष: शुक्ल
दिन: शुक्रवार
ऋतु: ग्रीष्म
तिथि: पंचमी– दोपहर 12.33 तक, इसके बाद षष्ठी
नक्षत्र: आर्द्रा और पुनर्वसु
करण: बालव और कौलव
सूर्योदय - 5:54 AM
सूर्यास्त - 6:52 PM
चन्द्रोदय- 9:45 AM
चन्द्रास्त -11:52 PM
अभिजीत मुहूर्त:  11:57 AM से 12:49 PM

6 मई का अशुभ समय (इस दौरान कोई भी शुभ काम न करें)
यम गण्ड - 3:38 PM – 5:15 PM
कुलिक - 7:31 AM – 9:09 AM
दुर्मुहूर्त - 08:30 AM – 09:21 AM और 12:49 PM – 01:41 PM
वर्ज्यम् - 10:49 PM – 12:37 AM

कैसे करते हैं कालगणना?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, 2 नाड़ी का 1 मुहूर्त होता है। दिन-रात के घटने-बढ़ने के अनुसार 6 या 7 नाड़ी का 1 प्रहर कहलाता है। 15 दिन-रात का 1 पक्ष माना गया है और दो पक्षों का एक मास। ये 2 पक्ष हैं शुक्ल और कृष्ण। ये पक्ष ही पितरों के दिन-रात कहलाते हैं। 2 मास की 1 ऋतु होती है और और 6 मास का 1 अयन होता है। अयन दक्षिणायन और उत्तरायन दो प्रकार का होता है। ये दोनों अयन मिलकर देवताओं के 1 दिन-रात होते हैं तथा मनुष्य लोक में ये 1 वर्ष या 12 महीने होते हैं।

इस समय चल रहा है राक्षस संवत्सर
कालगणना के अनुसार, वर्तमान में विक्रम संवंत् 2079 चल रहा है। अभी तक कलियुग के 5124 वर्ष बीत चुके हैं। कलियुग के आरंभ में 36000 वर्ष संध्याकाल का मान होता है। इस हिसाब से अभी कलियुग की संध्या के ही 30876 सौर वर्ष यानी साल बीतने बाकी हैं। पंचांग के अनुसार इस समय राक्षस संवत्सर चल रहा है जो शिवविंशति के अंतर्गत नौवां संवत्सर है। दशम इन्द्राग्नि युग में इसकी गणना चौथी है। इसके स्वामी इन्द्राग्नि और अधिष्ठातृ बृहस्पति देवता इसकी राशि व तुला व स्वामी श्री शुक्र हैं।
 

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