
खाना बनाना, घर को साफ-सुथरा रखना, परिवार चलाना, सबका ख्याल रखना।।। महिलाओं की जिम्मेदारियों की लिस्ट कभी खत्म नहीं होती। चाहे वो बाहर जाकर काम करती हो या हाउसवाइफ हो, कुछ जिम्मेदारियां तो जैसे उसके लिए फिक्स ही कर दी गई हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि लड़कों को बचपन से यह सिखाया ही नहीं जाता कि उन्हें भी घर के काम करने हैं। लेकिन बेटी के पैदा होते ही, उसे बचपन से ही ससुराल में निभाने वाली जिम्मेदारियों की ट्रेनिंग दी जाने लगती है। जमाना बदल गया है, लेकिन कई घरों में आज भी यही सोच कायम है।
कभी-कभी तो अदालतें भी ऐसी ही सोच के साथ फैसले सुना देती हैं, जिससे मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। ऐसे ही एक निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। एक पति ने यह कहते हुए तलाक की अर्जी दी थी कि उसकी पत्नी अच्छा खाना नहीं बनाती और यह एक तरह की क्रूरता है। हैरानी की बात यह है कि एक फैमिली कोर्ट ने इस अर्जी को मंजूर भी कर लिया था। अब इस फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कड़ी फटकार लगाई है।
कोर्ट ने साफ कहा, "याद रखिए, पत्नी सिर्फ खाना बनाने और घर के काम करने वाली नौकरानी नहीं है, वो आपकी जीवन संगिनी है।" कोर्ट ने आगे कहा कि पत्नी ने यह नहीं किया, वो नहीं किया, खाना नहीं बनाया, ऐसी शिकायतें करने के बजाय पति को भी खाना पकाने, सफाई करने जैसे घर के कामों में बराबर हाथ बंटाना चाहिए। जजों ने कहा कि सिर्फ खाना न बनाने को क्रूरता बताकर तलाक मांगना बेहद अफसोसनाक है!
जस्टिस ने कहा कि खाना पकाने, सफाई और कपड़े धोने जैसे सभी कामों में पति को बराबर का भागीदार होना चाहिए। आज का दौर अलग है। पति को यह समझना होगा कि उसने किसी घरेलू सहायिका (maid) से नहीं, बल्कि एक जीवन साथी से शादी की है। उसे पत्नी को नौकरानी की तरह नहीं, बल्कि जीवन संगिनी के तौर पर सम्मान देना चाहिए।
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