Divorce Month: सबसे ज़्यादा तलाक 'उस' महीने में ही क्यों होते हैं? जानें राज

Published : Jan 12, 2026, 03:59 PM IST
AI जनरेटेड फोटो

सार

जनवरी को अनौपचारिक रूप से 'तलाक़ का महीना' कहा जाता है, क्योंकि इस दौरान तलाक़ की अर्जियाँ 33% तक बढ़ जाती हैं। इसके मुख्य कारण छुट्टियों का तनाव, नए साल में नई शुरुआत की इच्छा और वित्तीय सुविधा हैं।

यह बात कहने में थोड़ी अजीब लगती है, लेकिन यह सच है। पता है क्या? हर साल के पहले महीने, यानी जनवरी को 'तलाक़ का महीना' कहा जाता है। यह कोई दुनिया या भारत की तरफ से की गई घोषणा नहीं है। लेकिन, अगर साल भर के तलाक़ के आँकड़ों को देखें, तो हैरानी की बात है कि सबसे ज़्यादा तलाक़ जनवरी में ही होते हैं। हर नए साल की शुरुआत में सोशल मीडिया पर नए साल का जश्न 'मैं' शब्द से शुरू होता है। यह 'न्यू ईयर, न्यू ईयर रेजोल्यूशन' जैसे नारों से भरा होता है। ज़िंदगी में नए बदलाव लाने के फैसलों के बीच, कई जोड़े अनजाने में कुछ नया करने के तौर पर तलाक़ का रास्ता चुन लेते हैं। इसी वजह से, कानूनी हलकों में जनवरी को अनौपचारिक रूप से तलाक़ का महीना (Divorce Month) कहा जाता है।

एक तरफ़ नई उम्मीदों का जश्न होता है, तो दूसरी तरफ़ फैमिली कोर्ट तलाक़ की अर्जियों से भर जाते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ज़्यादातर तलाक़ की अर्जियाँ जनवरी में ही दायर की जाती हैं। हर साल ऐसा ही होने की वजह से साल का पहला महीना इस बदनामी का शिकार हो गया है।

सिर्फ़ एक इत्तफ़ाक़ नहीं

लेकिन, यह सिर्फ़ एक इत्तफ़ाक़ नहीं है, इसके पीछे मानसिक और सामाजिक कारणों की एक पूरी सीरीज़ है। हर साल जब जनवरी आता है, तो मकर संक्रांति के त्योहार की खुशी तो होती है, लेकिन इसी महीने के बारे में चौंकाने वाली रिपोर्टें कानूनी और मनोविज्ञान के क्षेत्र में चर्चा का विषय बन जाती हैं। इस बारे में आँकड़े ही सच्चाई बयां करते हैं।

आँकड़े क्या कहते हैं?

वाशिंगटन विश्वविद्यालय द्वारा दशकों तक किए गए एक शोध के अनुसार, दूसरे महीनों की तुलना में जनवरी में तलाक़ की अर्जियों की संख्या में अचानक 33% की भारी बढ़ोतरी होती है। 'रिचर्ड नेल्सन एलएलपी' संस्था की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेट सर्च इंजन पर भी 'जल्दी तलाक़' या 'DIY तलाक़' जैसे शब्दों की खोज इस दौरान अपने चरम पर होती है।

जनवरी में ही ऐसा क्यों?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस "अलगाव के ट्रेंड" के कुछ मुख्य कारण यहाँ दिए गए हैं…

1. त्योहारों का पुराना तनाव: जोड़ों के बीच समस्याएँ होने के बावजूद, कई लोग सोचते हैं कि दिसंबर के क्रिसमस और नए साल के जश्न में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए और वे शांत रहते हैं। मनोचिकित्सक डॉ. करेन फिलिप्स का कहना है कि ऐसे जोड़ों की संख्या बहुत बड़ी है जो यह सोचकर छुट्टियाँ बिताते हैं कि यह उनके साथी के साथ उनका आखिरी जश्न होगा।

2. छुट्टियों का आर्थिक और पारिवारिक बोझ: दिसंबर में होने वाले ज़्यादा खर्च और परिवार के सदस्यों से मिलने से पैदा होने वाला मानसिक तनाव, मौजूदा रिश्तों की पुरानी दरारों को और भी बड़ा कर देता है। कई लोगों को लगता है कि इस बोझ को उतारने के लिए जनवरी एक अच्छा समय है।

3. 'नया साल-नई शुरुआत' का संकल्प: नया साल एक नई शुरुआत का प्रतीक है। जो लोग अपनी शादीशुदा ज़िंदगी से नाखुश हैं, वे अपनी व्यक्तिगत भलाई और खुशी के लिए इस बोझिल रिश्ते से छुटकारा पाकर एक नई ज़िंदगी शुरू करने का फैसला जनवरी में ही करते हैं।

4. कानूनी और आर्थिक सुविधा: विशेषज्ञों की राय है कि चूँकि जनवरी एक नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत का संकेत देता है, इसलिए टैक्स लाभ, स्वास्थ्य बीमा और संपत्ति के बँटवारे जैसी कानूनी प्रक्रियाओं के लिए यह समय ज़्यादा सुविधाजनक होता है। यह पहलू तलाक़ के लिए एक वरदान साबित हो रहा है।

समाधान क्या है? विशेषज्ञों की सलाह…

कानूनी और परिवार सलाहकार (Counsellors) मानते हैं कि जीवन में किसी भी समस्या का अंतिम समाधान तलाक़ नहीं है। ज़्यादातर मामलों में, जोड़े आपसी बातचीत से अपने रिश्ते को सुधार सकते हैं।

बातचीत: पति-पत्नी के बीच झगड़ा आम बात है, लेकिन ज़्यादातर बार इसे बातचीत से ही सुलझाया जा सकता है।

सलाह (Counseling): तलाक़ का फैसला लेने से पहले पेशेवर सलाह लेना बेहतर होता है।

परिवार का साथ: जब जोड़े अलग होना चाहते हैं, तो परिवार के बड़ों को उन्हें अलग करने के बजाय, उन्हें एक साथ लाने की कोशिश करनी चाहिए। कई बार यह निश्चित रूप से फ़ायदा पहुँचाता है।

बाहरी लोगों का दखल न हो: जोड़ों के बीच आग लगाने वाले तीसरे व्यक्ति से दूर रहना रिश्ते के लिए अच्छा होता है। अगर कोई मनमुटाव है, तो उसे बाहर बताने के बजाय आपस में ही सुलझा लेना बेहतर है।

कुल मिलाकर, यह सच है कि जनवरी महीने पर 'तलाक़ का महीना' होने का बुरा ठप्पा लगा हुआ है। दुनिया उम्मीद कर रही है कि यह ठप्पा हटे और तलाक़ की संख्या में ही कमी आए, न कि यह किसी और महीने पर चला जाए। लेकिन, क्या यह संभव है? क्योंकि, जैसे-जैसे साल बीत रहे हैं, तलाक़ की संख्या में भी बढ़ोतरी ही दिख रही है, जो एक चौंकाने वाली सच्चाई है।

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