
नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए पूर्व केंद्रीय मंत्री बालासाहेब विखे पाटिल की आत्मकथा का विमोचन किया। इसके अलावा उन्होंने 'प्रवर रूरल एजुकेशन सोसाइटी' का नाम बदलकर 'लोकनेते डॉ बालासाहेब विखे पाटिल प्रवर रूरल एजुकेशन सोसाइटी' रखा। बालासाहेब विखे पाटिल का निधन 2016 में 84 साल की उम्र में हुआ था। वे एनडीए और यूपीए दोनों सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे।
बालासाहेब विखे पाटिल जीवन भर कांग्रेसी रहे। लेकिन वे 1998 में शिवसेना के टिकट पर चुनाव लड़े और संसद पहुंचे। उन्होंने 1999 में अटल बिहारी सरकार में राज्यमंत्री बनाया गया। हालांकि, 2004 में जब यूपीए सत्ता में आई तो वे दोबारा कांग्रेस में आ गए। पाटिल को मनमोहन सिंह सरकार में भारी उद्योग मंत्री बनाया गया था। 2016 में उनका निधन हो गया था। वे 14वीं लोकसभा में भी संसद पहुंचे थे।
7 बार सांसद बने बालासाहेब
बालासाहेब कॉपरेटिव मूवमेंट के बड़े किसान नेता थे। वे अहमदनगर से 7 बार सांसद बनकर सदन पहुंचे। बालासाहेब पाचवीं, छठी, सातवीं, आठवीं, नौवीं, 12वीं, 13वीं और 14वीं लोकसभा में सदस्य रहे।
राजीव गांधी ने हरवाया था चुनाव
बालासाहेब विखे पाटिल 1971 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर सांसद पहुंचे थे। लेकिन 1991 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2019 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शरद पवार ने खुलासा किया था कि 1991 के लोकसभा चुनाव में विखे पाटिल ने कांग्रेस के खिलाफ बगावत छेड़ दी थी। उन्होंने निर्दलीय ये चुनाव लड़ा था। शरद पवार ने दावा किया था कि उन्हें राजीव गांधी के कहने पर चुनाव हरवाया गया था।
बेटे और पोते भी भाजपा में हुए शामिल
2019 विधानसभा चुनाव से पहले बालासाहेब विखे पाटिल के बेटे राधाकृष्ण विखे पाटिल और पोते सुजय विखे पाटिल ने भी कांग्रेस का दामन थाम लिया।
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