
नई दिल्ली. केंद्र सरकार लोकसभा में नागरिकता संशोधन बिल पेश करेगी। बुधवार को कैबिनेट ने इस बिल को मंजूरी दी थी। अब कैबिनेट की मंजूरी के बाद इसे गृह मंत्री अमित शाह सदन में पेश करेंगे। इस विधेयक से पड़ोसी देश अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के गैर मुस्लिमों (हिंदु,सिख,जैन,बौद्ध,पारसी,ईसाई) को भारतीय नागरिकता देने में आसानी होगी।
नागरिकता संशोधन के विरोध में कौन है?
- इस बिल के विरोध में एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, "यह बिल संविधान के आर्टिकल 14 और 21 के खिलाफ है। नागरिकता को लेकर एक देश में दो कानून कैसे हो सकते हैं। सरकार धर्म की बुनियाद पर ये कानून बना रही है। सरकार देश को बांटने की कोशिश कर रही है। फिर से टू नेशन थ्योरी को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार चाह रही है कि मुसलमान देश में दोयम दर्जे का नागरिक बन जाए।"
- कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी बिल का विरोध किया। उन्होंने कहा, "यह बिल संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। धर्म किसी की राष्ट्रीयता नहीं तय कर सकता है। हमारा देश सबके लिए है।"
- आरजेडी सांसद मनोज झा ने भी इस बिल का विरोध किया। उन्होंने कहा कि भारत को इजराइल बनाने की कोशिश की जा रही है। विशेष धर्म के लोगों के लिए खास मुल्क।
- सीपीआई ने भी बिल का विरोध किया। पार्टी के महासचिव डी राजा ने कहा कि डॉक्टर अंबेडकर ने संविधान सभा में जोर देकर धार्मिक मुल्क का विरोध किया था।
क्या है नागरिकता संशोधन बिल?
- बिल के तहत 1955 के सिटिजनशिप एक्ट में बदलाव किया जाएगा।
- पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आकर भारत में बसे हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रस्ताव।
- इन समुदायों के उन लोगों को नागरिकता दी जाएगी, जो बीते एक साल से लेकर 6 साल तक में भारत आकर बसे हैं।
- अभी भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए यह समय सीमा 11 साल की है।
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