देश में कानूनी पेशा सामंती और पितृसत्तात्मक...CJI ने बताया क्यों महिलाओं की भागीदारी है कम

Published : Nov 12, 2022, 07:19 PM ISTUpdated : Nov 12, 2022, 08:08 PM IST
देश में कानूनी पेशा सामंती और पितृसत्तात्मक...CJI ने बताया क्यों महिलाओं की भागीदारी है कम

सार

भारतीय सुप्रीम कोर्ट और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के बीच तुलना पर सीजेआई ने कहा कि दोनों देशों के एपेक्स कोर्ट्स की तुलना नहीं की जा सकती है, हमारे यहां अधिक भार है और संसाधन कम। यूएस सुप्रीम कोर्ट एक वर्ष में कुल 180 से अधिक मामलों की सुनवाई करता है या यूके सुप्रीम कोर्ट जो एक वर्ष में 85 मामलों की सुनवाई करता है। 

CJI DY Chandrachud on gender equality in Judiciary: भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को न्यायपालिका में महिलाओं की उचित भागीदारी नहीं होने पर कहा कि देश में कानूनी पेशे की संरचना सामंती और पितृसत्तात्मक है। यह महिलाओं को समायोजित नहीं करती है। न्यायपालिका में अधिक महिलाओं और समाज के हाशिए के वर्गों के प्रवेश के लिए एक लोकतांत्रिक और योग्यता आधारित प्रक्रिया की आवश्यकता है ताकि सबकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सके।

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में और अधिक महिलाओं के होने की बात जब हम करते हैं तो हमारे लिए यह भी उतना आवश्यक है कि हम महिलाओं के लिए एक ऐसा फ्रेंडली माहौल बनाएं ताकि जब कोई नया महिला वकील किसी सीनियर वकील के चैंबर में दाखिल हो तो उसे वह जगह केवल पुराने लड़कों का क्लब न लगे। 

कनेक्शनों का इस्तेमाल कर जब चैंबर्स होंगे अलॉट तो कैसे मिलेगा सबको मौका

एक मीडिया हाउस के समिट में बोलते हुए सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि महिलाएं और वंचित वर्गों को तबतक न्यायापालिका के क्षेत्र में आगे बढ़ने का मौका नहीं मिलेगा जबतक अपने कनेक्शनों का इस्तेमाल करके चैंबर्स तक पहुंचना बंद न हो जाए। कानूनी पेशा में एंट्री से लेकर अन्य हर स्तर पर लोकतांत्रिक और योग्यता आधारित मौके मिलने चाहिए। इससे इस पेश में महिलाओं और अन्य लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी।

लाइव स्ट्रीमिंग एक नया प्रयोग...

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कोर्ट की सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग एक नया प्रयोग था। इससे पूरा देश जाना कि कानूनी व्यवस्था को बदलने के लिए तकनीक का क्या रोल है। सुप्रीम कोर्ट ही नहीं, हाईकोर्ट्स, जिला न्यायालयों की कार्यवाही का भी सीधा प्रसारण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र में सबसे बड़े खतरों में से एक अपारदर्शी होने का खतरा है। जब आप अपनी प्रक्रिया को सार्वजनिक रखते हैं तो आप कुछ हद तक जवाबदेह तय करने के साथ पारदर्शिता लाते हैं। इससे नागरिकों में भी विश्वास की भावना पैदा होती है। 

हमारी संरचना और प्राथमिकताएं अन्य देशों से जुदा

भारतीय सुप्रीम कोर्ट और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के बीच तुलना पर सीजेआई ने कहा कि दोनों देशों के एपेक्स कोर्ट्स की तुलना नहीं की जा सकती है क्योंकि हमारे यहां के कोर्ट के लिए हमारे पास एक विशिष्ट भारतीय संरचना है। हमारे यहां अधिक भार है और संसाधन कम। जब आप हमारी तुलना यूएस सुप्रीम कोर्ट से करते हैं जो एक वर्ष में कुल 180 से अधिक मामलों की सुनवाई करता है या यूके सुप्रीम कोर्ट जो एक वर्ष में 85 मामलों की सुनवाई करता है। जबकि भारत का सुप्रीम कोर्ट ऐसा है जहां हर शुक्रवार व सोमवार को यहां का हर एक जज 75-80 मामलों की सुनवाई कर लेता है। जबकि मंगलवार, बुधवार व गुरुवार को कम से कम 30-40 मामले एक न्यायाधीश सुनवाई करता है।

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