
नेशनल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट सभागार में आज जस्टिस कृष्ण मुरारी का विदाई समारोह आयोजित किया गया था। न्यायाधीश कृष्ण मुरारी शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए हैं। इस इमोशनल ईवनिंग पर कई न्यायाधीश भी शामिल हुए थे। न्यायाधीश के विदाई समारोह की यह शाम कविताओं और शायरियों के साथ भावनात्मक मोड़ पर पहुंच गई थी। अपने सहयोगी की विदाई पर बड़े-बड़े जज भी शायर बनते देखे गए।
सीजेआई चंद्रचूड़ ने शायरी से लुभाया
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) की ओर से आयोजित विदाई समारोह में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के अपने साथी के सम्मान में पढ़ी शायरी से सभी न्यायाधीशों को लुभाया। सीजेई चंद्रचूड़ ने इस अवसर पर कवि बशीर बद्र की लाइनें ‘ मुसाफिर हैं हम भी, मुसाफिर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी’ पढ़कर सभी की तालियां बटोरीं।
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जस्टिस चंद्रचूड़ ने निवर्तमान न्यायाधीश के पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि जस्टिस मुरारी हमेशा से बहुत शांत रहते थे और कभी अपना आपा नहीं खोते थे। उन्होंने अपने बोली में 'कानपुरी टच' के बारे में भी बताया।
जस्टिस मुरारी को करना पड़ा संघर्ष
सीजेआई ने खुलासा किया कि जब कोर्ट विद आउट पेपर हो गई तो जस्टिस मुरारी को शुरुआत में काफी संघर्ष करना पड़ा। पांच सदस्यीय संविधान पीठ के सदस्य के तौर पर शिवसेना और दिल्ली सरकार के अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान जस्टिस मुरारी को लैपटॉप और आई-पैड का इस्तेमाल करने में काफी दिक्कत हुई. न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा ने उस वक्त उनकी काफी मदद की। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि 'आपके साथ कुछ लम्हे, कई यादें बतौर इनाम मिले, एक सफर पर निकले और तुझ्बे तमाम मिले'। इसी शायरी के साथ सीजेआई ने अपना भाषण खत्म किया।
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जूडिशियल क्लर्क्स से लेते थे हेल्प
न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी ने कहा कि वह भाग्यशाली हैं कि डीवाई चंद्रचूड़ दो बार मुख्य न्यायाधीश रहे। एक बार इलाहाबाद हाईकोर्ट में और फिर सुप्रीम कोर्ट में। न्यायमूर्ति ने अपने सहयोगियों के प्रति उदार रहने के लिए सीजेआई चंद्रचूड़ को धन्यवाद दिया। न्यायमूर्ति मुरारी ने खुलासा किया कि वह न्यायिक क्लर्कों से आई-पैड को हैंडल करने के लिए मदद मांगते थे। उन्होंने सीजेआई को धन्यवाद दिया कि उनके कारण मैं आईटी के साथ जुड़ सका। क्योंकि आज के युग में बिना इसके काम करना मुश्किल है। अंत में जस्टिस मुरारी ने भी दो लाइनें पढ़ीं और भाषण खत्म किया ''कदम उठे भी नहीं और सफर तमाम हुआ, गजब है राह का इतना भी मुख्तसर होना''।
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