86 साल के ससुर, पति एवं मैं खुद पॉजिटिव थी, डर भी लगा, हिम्मत भी टूटी...लेकिन आत्मविश्वास से जीती जंग

Published : May 27, 2021, 07:30 AM ISTUpdated : May 31, 2021, 04:07 PM IST
86 साल के ससुर, पति एवं मैं खुद पॉजिटिव थी, डर भी लगा, हिम्मत भी टूटी...लेकिन आत्मविश्वास से जीती जंग

सार

Asianetnews Hindi के लिए प्रभंजन भदौरिया ने राजस्थान के जोधपुर में रहने वालीं गृहिणी निर्मल राठौड़ से बात की। कोरोना से जीतने वालों की कहानियों की इस कड़ी में पढ़िए कैसे निर्मल और उनके परिवार ने मौत का डर निकाल कर आत्मविश्वास जगाकर कोरोना को मात दी। हालांकि यह लाजिमी है कि शुरुआत में उन्हें भी डर लगा, हिम्मत टूटती-सी नजर आई...लेकिन फिर कोरोना को हराने के लिए तन-मन से उठ खड़े हुए।

नई दिल्ली. Asianetnews Hindi के लिए प्रभंजन भदौरिया ने राजस्थान के जोधपुर में रहने वालीं गृहिणी निर्मल राठौड़ से बात की। कोरोना से जीतने वालों की कहानियों की इस कड़ी में पढ़िए कैसे निर्मल और उनके परिवार ने मौत का डर निकाल कर आत्मविश्वास जगाकर कोरोना को मात दी। हालांकि यह लाजिमी है कि शुरुआत में उन्हें भी डर लगा, हिम्मत टूटती-सी नजर आई...लेकिन फिर कोरोना को हराने के लिए तन-मन से उठ खड़े हुए।

अक्सर लोग कोरोना होने पर डर जाते हैं, जबकि इस संक्रमण का आधा खतरा तो अंदर की ताकत से दूर हो जाता है। यह सही है कि कोरोना की दूसरी लहर ने लोगों के दिलो-दिमाग पर बुरा असर डाला, लेकिन जिन्होंने खुद का टूटने नहीं दिया, वे जल्दी इस बीमारी को हराकर निकल आए। कोरोना से घबराने की बजाय आत्मबल मजबूत कर सकारात्मक सोच के साथ इससे लड़ा जाए, तो इलाज इतना मुश्किल नहीं है। इस बीमारी से डरें नहीं। सुने सबकी लेकिन गौर केवल डॉक्टर की बातों पर करें। क्योंकि ठीक होने वालों के सबके अलग-अलग अनुभव रहे हैं। जरूर नहीं किसी का अनुभव आप पर फिट बैठे।

Asianetnews Hindi के लिए प्रभंजन भदौरिया ने राजस्थान के जोधपुर में रहने वालीं गृहिणी निर्मल राठौड़ से बात की। आइए पढ़ते हैं उनकी कहानी कि कैसे उन्होंने संक्रमण का सामना किया...

तूफान जब गुजर जाता है, तो कई अनुभव छोड़ जाता है
तूफान जब गुजर जाता है, तो अपने पीछे कई तरह के अनुभव एवं निशां छोड़ जाता है।  मेरा नाम निर्मल राठौड़ है। मैं गृहिणी हूं तथा अपने ससुर एवं पति एवं दो बच्चों के साथ जोधपुर में रहती हूं। पति मीडिया की फील्ड में हैं। कोरोना के चलते वर्क फ्रॉम होम ही चल रहे हैं। हम अपने पैतृक गांव से दूर किराये के मकान में रहते हैं। चूंकि जोधपुर आए हमको सवा साल ही हुआ इसलिए इतनी जान-पहचान भी नहीं। वैसे भी कोरोना के चलते जल्दी से कोई मदद की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता। फिर भी अपनी हिम्मत, हौसले एवं ठीक होने की दृढृ इच्छाशक्ति ने न केवल मैंने खुद को ठीक किया है बल्कि ससुर एवं पति भी ठीक हुए। 

दरअसल, बीता एक माह मेरे लिए एवं मेरे परिवार के लिए किसी तूफान से कम नहीं था। विशेषकर 18 अप्रैल से 11 मई तक का समय तो कभी भुलाए नहीं भूल पाऊंगी। चौतरफा संकट से घिरी थी। 18 अप्रैल को परिवार में एक साथ चार जनों को अचानक बुखार आने से एक बार तो मैं बेहद डर गई। 86 साल के बुजुर्ग ससुर, 45 साल के पति तथा दोनों बच्चे तेज बुखार से तपने रहे थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या करूं? घर में पहली बार एक साथ चार जनों को बुखार देखकर मेरा डरना स्वाभाविक भी था। थोड़ा हिम्मत से काम लेते हुए मैं मेडिकल स्टोर गई। वहां चारों के लक्षण बताए, तो उसने तीन-चार तरह की टेबलेट दी। वह लेकर मैं तत्काल घर आई। सभी को टेबलेट दी। दवा के साथ देसी दवाएं मसलन, काढ़ा पीने तथा भाप आदि लेने का काम भी साथ-साथ शुरू कर दिया। चूंकि सभी को जांच से पहले ही लक्षण के आधार पर इलाज शुरू कर दिया गया। नारियल पानी आदि भी शुरू से ही पीने लगे।



संकट अभी टला नहीं था
पांच दिन की दौड़ धूप के बाद सभी का बुखार उतरा, हालांकि बच्चे तो दो दिन में ठीक हो गए थे, लेकिन रहना-सोना सब साथ-साथ ही था। पांचवें दिन 22 अप्रैल को पति की हालत में सुधार होने पर हम पति-पत्नी जांच के लिए नजदीकी अस्पताल गए और सैंपल देकर आ गए। हालांकि उस दिन पहली बार मुझे थकान एवं हरारत महसूस हो रही थी। अगले दिन 23 अप्रैल को हम दोनों की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। इसके बाद ससुरजी की जांच करवाई तो 24 को उनकी रिपोर्ट भी पॉजिटिव भी आ गई। इसके बाद हमने दोनों बच्चों को मैंने दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया। कोरोना से आई कमजोरी के कारण मेरा उठना एवं रसोई का काम दूभर हो गया था, लेकिन और कोई विकल्प भी नहीं था। मुझे खुद को भी संभालना भी था और बाकी सभी का ख्याल भी रखना था।

ससुरजी की तबीयत मेरे लिए सबसे बड़ा संकट थी
हम पति-पत्नी धीरे-धीरे रिकवर हो रहे थे, लेकिन ससुरजी कोरोना से एकदम टूट गए। उनका उठना-बैठना, चलना-फिरना सब बंद हो गया। मतलब कुछ बिस्तर पर ही। पतिदेव बड़ी मुश्किल से उनको सहारा देकर बाथरूम तक लेकर जाते है, लेकिन ससुर को सहारा देते-देते वो भी हांफ जाते। मुझसे यह सब देखा नहीं जाता, लेकिन मन मजबूत करके मैंने उनको कभी अपनी कमजोरी महसूस नहीं होने दी। अब मेरे सामने बड़ा संकट ससुरजी की कब्ज थी। 10 दिन से वो टॉयलेट नहीं गए थे। चिकित्सकों की सलाह पर बार-बार दवाई बदली, लेकिन उनकी कब्ज नहीं टूट रही थी। यह मेरे लिए बड़ा संकट था।

दोहरे संकट ने मुश्किल में डाला
ससुरजी की कब्ज के लिए दवा बदलने का क्रम जारी था कि एक दु:खद खबर ने मुझे डरा दिया। पैतृक गांव से खबर आई कि कोरोना ने रिश्ते के देवर को लील लिया। पति और मैं इस दु:खद खबर से उबरे भी नहीं थे कि उस दिन रात को ससुर जी का डाइपर एवं बिस्तर खून से सना दिखा। पता नहीं दवाओं का असर था या रिएक्शन उनको खूनी लूज मोशन होने लगे। समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए? पति ने काफी जगह फोन आदि किए, लेकिन कोरोना के चलते कहीं से कोई मदद नहीं मिली। आखिरकार उनके स्टाफ के बंदे ने अपने परिचित दो बंदों को घर भिजवाया। दोपहर हो चुकी थी। ससुर जी एवं एकदम निष्प्राण एवं निढाल हो चुके थे। ऊपर के मकान की तंग एवं घुमावदार सीढ़ियों से उनको नीचे एम्बुलेंस तक लाना संभव नहीं था। इस कारण उनको चादर में लपेटकर पोटली सी बनाकर बड़ी मुश्किल से नीचे उतारा। उस वक्त बड़ी कोफ्त से भी हुई, जब लोग मदद की बजाय मोबाइल से वीडियो बना रहे थे।

सरकारी से प्राइवेट में अस्पताल में करवाया भर्ती
पति, ससुरजी को लेकर जोधपुर के मथुरादास माथुर अस्पताल लेकर गए। करीब दो ढाई घंटे वहां ससुर जी को आपातकालीन उपचार दिया गया, लेकिन वहां के माहौल ने उनको डरा दिया। शाम को उन्होंने अस्पताल से फोन किया और वहां के हालात बताए, तो हमने सामूहिक रूप से तय किया कि घर के पास किसी प्राइवेट अस्पताल में भर्ती करवा दिया जाए, ताकि हम एक-दूसरे को रिलीव कर सकें। ससुर जी पांच मई से 11 मई तक अस्पताल में भर्ती रहे। रात को और दिन में पति ही उनके पास रहते, लेकिन नहाना एवं खाने वो घर आते तब तक रिलीवर की भूमिका मैं निभाती। खैर,अब हम सब ठीक हैं, लेकिन वह भयावह दिन याद आते हैं तो सच में रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

कोरोना ने हमें बहुत कुछ सिखा दिया
कोरोना के संघर्ष के दौरान हमने यही सीखा कि कोरोना होने पर घबराएं नहीं हिम्मत से काम लें। केवल अपनी चिकित्सक की सलाह पर गौर करें। जहां तक संभव हो सोशल मीडिया से बचें। सकारात्मक बने रहें, इच्छाशक्ति को मजबूत रखें। सामान्य जांच वाले उपकरण घर में अवश्य रखें। बाहरी उम्मीद छोड़कर घर में जितने भी सदस्य हैं टीम भावना से काम करें। मरीज का भरपूर मनोरंजन करें। उनकी पसंद का संगीत सुनाएं। क्योंकि कोई भी बीमारी इंसान की इच्छाशक्ति से बड़ी नहीं होती है।

Asianet News का विनम्र अनुरोधः आईए साथ मिलकर कोरोना को हराएं, जिंदगी को जिताएं...। जब भी घर से बाहर निकलें माॅस्क जरूर पहनें, हाथों को सैनिटाइज करते रहें, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें। वैक्सीन लगवाएं। हमसब मिलकर कोरोना के खिलाफ जंग जीतेंगे और कोविड चेन को तोडेंगे। #ANCares #IndiaFightsCorona

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