
नई दिल्ली. जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला को शुक्रवार को हिरासत से रिहा कर दिया गया। वे पिछले 7 महीने से घर पर ही नजरबंद थे। उन पर सरकार ने पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत कार्रवाई की थी। इसके तहत सरकार बिना ट्रायल के किसी को हिरासत में ले सकती है। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, सरकार ने फारूक के ऊपर से पीएसए को तत्काल प्रभाव से हटा दिया। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत तमाम नेता अभी भी हिरासत में हैं।
रिहा होने के बाद फारूक ने कहा, आज मेरे पास बोलने के लिए शब्द नहीं है। लेकिन मैं आज आजाद हूं। अब मैं दिल्ली जा सकूंगा और संसद सत्र में शामिल होकर आप सभी की बात रखूंगा।
जम्मू कश्मीर के गृह विभाग के मुताबिक, श्रीनगर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने 15 सितंबर 2019 को तीन महीने के लिए पीएसए के तहत हिरासत में लिया था। इसे दिसंबर 2019 में तीन महीने के लिए बढ़ा दिया गया था। अब प्रशासन ने इसे तत्काल प्रभाव से हटा दिया।
4 अगस्त 2019 से हिरासत में हैं पूर्व मुख्यमंत्री
केंद्र सरकार ने दोबारा सत्ता में आने के बाद 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाला आर्टिकल 370 वापस लिया था। साथ ही राज्य को जम्मू कश्मीर और लद्दाख दो केंद्रशासित राज्यों में बांटने का फैसला किया था। एहतियातन सरकार ने इस फैसले के एक दिन पहले पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला (83), उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत तमाम नेताओं को हिरासत में ले लिया था।
विपक्ष ने की थी रिहा करने की मांग
इससे कुछ दिन पहले ही 8 विपक्षी पार्टियों ने एक प्रस्ताव पास कर भाजपा सरकार से फारूक अब्दुल्ला समेत हिरासत में लिए गए तमाम नेताओं को जल्द रिहा करने की मांग की थी। प्रस्ताव में कहा गया था कि केंद्र की मोदी सरकार ने संविधान के तहत मिले न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के बुनियादी आदर्शों को खतरे में डाल दिया है।
जल्द रिहा हों तीनों नेता- प्रियंका गांधी
इससे पहले पिछले हफ्ते प्रियंका गांधी ने भी तीनों नेताओं को रिहा करने की मांग की थी। उन्होंने ट्वीट कर सवाल किया था, ''किस आधार पर उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के खिलाफ पीएसए लगाया गया है?'' उन्होंने ट्वीट कर लिखा, ''उमर और महबूबा ने भारत के संविधान को कायम रखा, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का अनुपालन किया और कभी भी हिंसा एवं विभाजन से संबंध नहीं रखा। वे बिना किसी आधार के अनिश्चितकाल के लिए कैद में रखे जाने के नहीं, बल्कि रिहा किए जाने के हकदार हैं।''
'क्रूर है पीएसए'
द्रमुक अध्यक्ष एम के स्टालिन ने कहा था कि भारत की अखंडता में यकीन करने वाले नेताओं को हिरासत में रखना मानवाधिकार और व्यक्तिगत आजादी के खिलाफ है और यह संविधान एवं लोकतंत्र में लोगों के विश्वास को धता बताने के समान है।
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