
From The India Gate: सियासी गलियारों में परदे के पीछे बहुत कुछ होता है- ओपिनियन, साजिश, सत्ता का खेल और राजनीतिक क्षेत्र में आंतरिक तकरार। एशियानेट न्यूज का व्यापक नेटवर्क जमीनी स्तर पर देश भर में राजनीति और नौकरशाही की नब्ज टटोलता है। अंदरखाने कई बार ऐसी चीजें निकलकर आती हैं, जो वाकई बेहद रोचक और मजेदार होती हैं। पेश है 'फ्रॉम द इंडिया गेट' (From The India Gate) का 43वां एपिसोड, जो आपके लिए लाया है, सत्ता के गलियारों से कुछ ऐसे ही मजेदार और रोचक किस्से।
OMG! उद्घाटन करने पहुंचे नेताजी, गेस्ट की लिस्ट में नहीं था नाम..
राजस्थान के एक बड़े कांग्रेसी नेता की जयपुर में भयंकर वाली बेइज्जती हो गई। ये मुख्यमंत्री जी के बेहद खास दोस्त माने जाते हैं। दबंग भी एक नंबर के, लेकिन पिछले दिनों कॉन्सटिट्यूशनल क्लब के उद्घाटन में उनकी दबंगई की हवा निकल गई। करोड़ों रुपयों की लागत से बन रहे इस क्लब का उद्घाटन CM ने किया। सीएम ऑफिस से इस सीनियर कांग्रेसी नेता को भी बुलाया गया था। सभी ने मिलकर फीता तो काट दिया लेकिन खुशनुमा माहौल में इस दिग्गज नेता का मूड खराब हो गया। हुआ यूं कि उद्घाटन वाले पोस्टर में सीएम के साथ छुटभैये नेताओं की तस्वीर खिलखिलाते चेहरों के साथ छपी थी, लेकिन सीनियर कांग्रेसी नेता की तस्वीर पोस्टर से गायब थी। अनांउसमेंट लिस्ट में भी इनका नाम नहीं था। ये सब देखकर नेताजी अंदर ही अंदर तिलिमिला उठे और समर्थकों के साथ दबे पांव वहां से निकल गए। अब पता लगाया जा रहा है कि ये जानबूझकर किया गया या अनजाने में हो गया।
वामपंथी सरकार का अजीबोगरीब संकट..
केरल की वामपंथी सरकार इस समय अजीबोगरीब संकट में है। दरअसल, कर्नाटक में राजनीतिक परिदृश्य पर नजर रखते हुए JDS सुप्रीमो देवेगौड़ा के NDA से हाथ मिलाने के बाद से ही LDF दुविधा में है। केरल में जेडीएस वाम मोर्चे का हिस्सा है। कैबिनेट में एक मंत्री के कृष्णन कुट्टी, जिनके पास बिजली विभाग है, जेडीएस का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस को अब एलडीएफ को पटखनी देने का मौका मिल गया है। कांग्रेस का कहना है कि केरल में अब LDF-NDA सरकार है। इस मसले को कैसे हाल करें, बिना उसकी तह तक गए एलडीएफ ने जेडीएस को उनके साथ आने या फिर डूब जाने का अल्टीमेटम दिया है। LDF का कहना है कि जेडीएस अपना पॉलिटिकल स्टैंड खुलकर बताए और वामपंथियों को शर्मिंदगी से बचाए। बता दें कि JDS के राज्य गुट के पास बेहद कम ऑप्शन बचे हैं, जिनमें लोकतांत्रिक जनता दल (LJD) के साथ विलय भी शामिल है। या फिर केरल यूनिट को पार्टी से अलग होना होगा और इसे एक नई यूनिट के रूप में गठित करना होगा।
नेताओं को बख्शने का मूड नहीं..
केरल में ऐसा उदाहरण देखने को मिल रहा है, जहां को-ऑपरेटिव बैंक रूट का कथित तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग के लिए प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया गया था। करिवन्नूर सहकारी बैंक घोटाले से पता चला है कि ये सांठगांठ कितनी गहरी है। सीनियर कॉमरेड एसी मोइदीन के करीबी सहयोगियों में से एक प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हिरासत में है। पार्टी के कुछ दूसरे टॉप लीडर्स भी जांच एजेंसी के रडार पर हैं और उनसे कई बार पूछताछ की जा चुकी है। दुख की बात है कि जिन जमाकर्ताओं ने पैसा खोया, वे भी पार्टी के मेंबर हैं। मामले का हल निकालने के लिए केरल बैंक- सभी सहकारी बैंकों को कवर करने वाले करुवन्नूर बैंक को जल्द ही 100 करोड़ रुपये का लोन देगा, ताकि वो अपने जमाकर्ताओं को पैसे का भुगतान कर सके। हालांकि, कोई भी जमाकर्ता अपनी पार्टी के नेताओं को माफ करने के मूड में नहीं है। डिपॉजिटर्स का कहना है कि भले ही उनकी जमा रकम वापस आ जाये, लेकिन इस बार वो किसी भी नेता को बख्शने के मूड में नहीं हैं।
पार्टी टाइम इन तमिलनाडु..
तमिलनाडु में BJP और AIADMK (अन्नाद्रमुक) के बीच गठबंधन टूटने के साथ ही राज्य में भारी राजनीतिक उठापटक देखने को मिल रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले, अन्नाद्रमुक के दोनों गुट एक साथ गठबंधन करने के लिए विभिन्न दलों को लुभा रहे हैं। कोयंबटूर, इरोड और सेलम के कोंगु क्षेत्र में मजबूत एडप्पादी (Edappadi) गुट बातचीत कर रहा है और विदुथलाई सिरुथथाई काची (VCK) या नाम तमिलर पार्टी (NTP) के लिए 10 सीटें छोड़ने के लिए तैयार है। 2019 के लोकसभा चुनाव में DMK को 33.52% वोट मिले थे। वहीं, AIADMK का वोट शेयर 19.30% था। कांग्रेस को जहां 12.61% वोट मिले, वहीं पट्टाली मक्कल काची (PMK) को 5.36% वोट मिले थे। विजयकांत की DMDK 2.16% और VCK 1.16% वोट पाने में कामयाब रही थीं। अब निगाहें पट्टाली मक्कल काची (PMK) पर हैं, जो DMK से हाथ मिलाने को तैयार है। शुरुआती बातचीत चल रही है। सूत्रों के मुताबिक, PMK को राज्यसभा की एक सीट दी जाएगी और ये फॉर्मूला दोनों पार्टियों को स्वीकार है।
माइक-असुरों का खौफ...
मध्यकाल से ही फ्री लांसर्स से बहुत डर लगता था। लेकिन कर्नाटक के मंत्री मीडिया में उन सभी तरह के 'लांसर्स' से डरते हैं, जिन्हें वे 'माइक-असुर' कहते हैं। परिणामस्वरूप, विधान सौधा जो हमेशा मंत्रियों से भरा रहता था- एक पावर सेंटर के रूप में अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। कैबिनेट बैठक के फौरन बाद तमाम मंत्री गायब हो जाते हैं और पड़ोस के अलग-अलग ऑफिसों से काम करते हैं। मंत्रियों का ये व्यवहार कमेंट्स का इंतजार करने वाली मीडिया से बचने की रणनीति का हिस्सा है। यहां तक कि अगर कोई मंत्री मीडिया के सवाल का जवाब देता है या चुप्पी बनाए रखना पसंद करता है, तो ये भी हेडलाइंस बन जाती है। ऐसे में नेता किसी भी मुद्दे पर इस पचड़े में नहीं फंसना चाहते। अब ये मुख्यमंत्री का काम है कि वे उन्हें माइक-असुरों के डर से होटलों या क्लबों में छिपने के बजाय 'पावर सेंटर' में लौटने का विश्वास दिलाएं, जहां वे वास्तव में हैं।
बार-BAR देखो..
प्यास बुझाने का वादा कर्नाटक में मुख्य चुनावी मुद्दों में से एक है। लेकिन सरकार को समझ नहीं आ रहा है कि कोप्पल में मतदाताओं की मांग को कैसे पूरा किया जाए। क्योंकि, वे पीने के पानी की तुलना में अपनी भूख को 'तृप्त' करने की कोशिश में ज्यादा से ज्यादा बार (BAR) चाहते हैं। हाल ही में, कोप्पल में DC ऑफिस में और ज्यादा बार खोलने की मांग को लेकर एक अजीबोगरीब विरोध प्रदर्शन देखा गया। गांववालों का कहना था कि उन्हें पड़ोस के गांव जाना पड़ेगा, जहां उन्हें शराब के लिए अधिक भुगतान करना होगा। ये कई लोगों के लिए अफोर्ड करना काफी मुश्किल है। इसलिए वे अपने ही गांव में बार चाहते हैं। वहीं, सरकार नए बार लाइसेंस के विरोध में है। ऐसे में ये मुद्दा एक राजनीतिक दुविधा बन गया है, क्योंकि कोई भी पार्टी अधिक बार का वादा करते हुए शराबबंदी की भावना के खिलाफ नहीं खड़े होना चाहेगी।
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