
चंडीगढ़. लोकसभा चुनाव के कुछ महीनों बाद हरियाणा में 90 सीटों के नतीजे बीजेपी के लिए ठीक साबित नहीं हुए। 2014 में अकेले दम अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई पार्टी इस बार त्रिशंकु के फेर में फंस गई है। हालांकि नतीजों में बीजेपी अब भी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी है। मगर उसका पड़ाव बहुमत से कुछ दूर ही ठहर गया।
वैसे विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी हिंदी पट्टी के सबसे रहस्यमयी राजनीतिक स्टेट को लेकर बेफिक्र थी। होना भी चाहिए था। लगभग हर चीज पार्टी के मुफीद थी। कांग्रेस में खिंचतान थी और पार्टी आंतरिक लड़ाई से जूझ रही थी। इनेलो और जेजेपी घर की आपसी लड़ाई में उलझी थी। दिग्गज पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल की विरासत पर कब्जा जमाने के लिए घर के ही लोग एक-दूसरे की टांग खींच रहे थे।
यही वजह थी कि पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष का पूरी तरह से सफाया कर दिया। वो चाहे हुड्डा हो या चौटाला, लोकसभा चुनाव में एक-एक कर सभी क्षत्रप खेत हो गए। राज्य की सभी लोकसभा सीटों पर पहली बार बीजेपी ने जबरदस्त कामयाबी हासिल की थी।
इस वजह से दिया आता 75 पार का नारा
लोकसभा चुनाव में मिली इसी कामयाबी की वजह से पार्टी ने चुनाव में "75 विधानसभा सीटों" को जीतने का नारा दिया। बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने विधानसभा चुनाव में हरियाणा की बजाय महाराष्ट्र में ज्यादा ताकत झोंकी। शरद पवार की सक्रिय मौजूदगी की वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह समेत बीजेपी के तमाम दिग्गजों ने महाराष्ट्र में ज्यादा से ज्यादा सभाएं कीं। लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि पार्टी ने जैसा सोचा था हरियाणा का रिजल्ट उससे ठीक उलट हुआ है।
अप्रासंगिक हो गए बीजेपी के जाट चेहरे
जाटलैंड में पार्टी बुरी तरह से खारिज हो गई। पार्टी के जाट चेहरे अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं। चुनाव में जाटों और मुसलमननों की लामबंदी की वजह से 2014 के चुनाव में तीसरे नंबर पर रही कांग्रेस 72 साल के भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में दूसरी बड़ी पार्टी बनने के साथ ही त्रिशंकु सदन में सत्ता के करीब भी नजर आ रही है। मुख्यमंत्री खट्टर के लिए ये बड़ी हार है।
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