यहां गांधी ने जलाई थी विदेशी वस्त्रों की होली, इस तरह क्रांतिकारियों को भेजा जाता था सीक्रेट मैसेज

Published : Oct 02, 2020, 05:09 AM ISTUpdated : Oct 02, 2020, 02:55 PM IST
यहां गांधी ने जलाई थी विदेशी वस्त्रों की होली, इस तरह क्रांतिकारियों को भेजा जाता था सीक्रेट मैसेज

सार

2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती है। आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के साथ यूपी के भी तमाम लोगो ने अतुलनीय योगदान दिया है। आज एशियानेट न्यूज हिंदी आपको उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ की कालाकांकर रियासत के बारे में बताने जा रहा है।

प्रतापगढ़ (UTTAR PRADESH ). 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती है। आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के साथ यूपी के भी तमाम लोगो ने अतुलनीय योगदान दिया है। आज एशियानेट न्यूज हिंदी आपको उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ की कालाकांकर रियासत के बारे में बताने जा रहा है। इस रियासत के राजाओं की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका रही है। यहां गांधीजी ने लोगों को जागरूक करने के लिए विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी। साल 1857 के प्रथम स्वंतत्रता संग्राम में यहां के राजा लाल प्रताप सिंह अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते शहीद हुए। 

आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी 14 नवंबर 1929 को कालाकांकर रियासत पहुंचे। यहां इन्होंने इस रियासत के राजा अवधेश सिंह के साथ लोगों को जागरूक किया। इसके बाद 28 नवंबर 1932 को एक चबूतरे पर तकरीबन 50 हजार विदेशी कपड़े जलाए गए थे। ये चबूतरा आज भी मौजूद है और इस दिन अब एक विशाल मेला लगता है। 

इतिहास के पन्नो में दर्ज है आजादी में इस रियासत का योगदान 
यूपी के प्रतापगढ़ में कई रियासतें हैं। यहां के कालकांकर रियासत के कई राजपूत राजाओं ने जंगे आजादी में अहम भूमिका निभाई थी। गोरखपुर जिले का मझौली गांव इस राजवंश का मूल स्थान रहा है। वहां से आकर इस वंश के राजा होम मल्ल राय ने मिर्जापुर स्थित बड़गौ पर अपना महल बनवाया था। साल 1193 में इनका राज्याभिषेक हुआ। इसके बाद साल 1808 में राजघराने में राजा हनुमत सिंह का जन्म हुआ और 1828 ई. में गद्दी पर बैठे। गंगा नदी के किनारे एक बेहद खूबसूरत स्थान को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया। इसे जगह को कालाकांकर रियासत के नाम से जाना गया।

आजादी की क्रान्ति लाने को निकाला था अखबार
जंगे आजादी की आग और तेज करने के लिए यहां के राजा रामपाल सिंह ने 1865 में हिंदोस्थान नामक हिंदी अखबार निकाला। इस अखबार की शुरुआत महात्मागांधी के हांथो हुई थी। साल 1887 में राजा रामपाल सिंह के कहने से इस अखबार में डॉ. मदन मोहन मालवीय ने चीफ एडिटर के रूप में काम किया।इस अखबार के जरिए मालवीय जी क्रांतिकारियों को सीक्रेट मैसेज भी भेजते थे। इसका स्पष्ट उल्लेख जंगे आजादी के इतिहास में भी मिलता है।

अंग्रेजों के साथ युद्ध में शहीद हुए थे राजा 
इस रियासत के राजा हनुमत सिंह के वृद्ध होने के बाद उनके बेटे राजा लाल प्रताप सिंह गद्दी संभाली। लेकिन उनका मन राजकाज में न लगकर देश को आजाद कराने के लिए बेचैन था। सुल्तानपुर जनपद स्थित चांदा नामक स्थान पर साल 1857 के प्रथम स्वंतत्रता संग्राम में अंग्रेजों से जमकर युद्ध किया। लगातर 8 दिन तक लड़ने के बाद राजा लाल प्रताप सिंह शहीद हो गए। 

आजादी के बाद देश की सियासत में इस रियासत का रहा मजबूत दखल 
आजादी के बाद कांग्रेस की सरकार बनी। आजादी में अहम भूमिका निभाने वाले इस रियासत के अंतिम राजा दिनेश सिंह को सरकार में प्रमुख स्थान मिला।1962 में वो बांदा से सांसद चुने गए और उन्हें केंद्रीय विदेश मंत्री बनाया गया। इसके बाद लगातार किसी न किसी रूप में 1995 तक सरकार के अंग रहे। उनकी बेटी राजकुमारी रत्ना सिंह भी दो बार सांसद रहीं।

क्या कहते हैं इतिहासकार ?
इतिहासकार डॉ बृज भानु सिंह बताते हैं, ''कालाकांकर राजघराने का जंगे आजादी में बड़ा योगदान रहा है। महात्मा गांधी ने जब भी गंगा किनारे के क्षेत्रों में आजादी की लड़ाई को धार देने की कोशिश की हमेशा इस घराने ने उनका साथ दिया। सही रूप में विदेशी वस्त्रों को जलाने के बाद लोगों में जागरूकता इसी रियासत की देन है। महात्मा गांधी हमेशा से ही इस राजघराने से जुड़े रहे हैं और इस रियासत ने आजादी की लड़ाई में उनका भरपूर साथ दिया है।''

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