'महिला की शादी हो जाने के आधार पर नौकरी से निकालना गलत', SC ने पूर्व आर्मी नर्स को 60 लाख का मुआवजा देने का निर्देश देते हुए सुनाया फैसला

Published : Feb 21, 2024, 03:39 PM ISTUpdated : Feb 21, 2024, 04:11 PM IST
SC Court

सार

सुप्रीम कोर्ट के जज संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने 14 फरवरी को एक मामले की सुनवाई की। मामले की मुताबिक सैन्य नर्सिंग सेवा (MNS) की एक स्थायी कमीशन अधिकारी पूर्व लेफ्टिनेंट सेलिना जॉन को अगस्त 1988 में सेना द्वारा सेवा से हटा दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट। देश के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी महिला को इस आधार पर नौकरी से बर्खास्त करना कि उसने शादी कर ली है, "लैंगिक भेदभाव और असमानता का एक बड़ा मामला" है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को एक पूर्व आर्मी नर्स को 60 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। महिला को बस इस आधार पर हटा दिया था कि उसने शादी कर थी।

सुप्रीम कोर्ट के जज संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने 14 फरवरी को एक मामले की सुनवाई की। मामले की मुताबिक सैन्य नर्सिंग सेवा (MNS) की एक स्थायी कमीशन अधिकारी पूर्व लेफ्टिनेंट सेलिना जॉन को अगस्त 1988 में सेना द्वारा सेवा से हटा दिया गया था। रिहाई आदेश में कहा गया है उसकी नौकरी इस आधार पर समाप्त कर दी गई कि उसी वर्ष अप्रैल में उसकी शादी हो गई थी और उसे वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में निम्न ग्रेड प्राप्त हुआ था।

पूर्व लेफ्टिनेंट सेलिना जॉन से संबंधित मामला

जॉन को 1982 में MNS में नियमों के अनुसार चुना गया था. उसके बाद उनको दिल्ली स्थित आर्मी हॉस्पिटल में प्रशिक्षु के रूप में शामिल किया गया। उन्हें 1985 में MNS में लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन दिया गया और सैन्य अस्पताल, सिकंदराबाद में तैनात किया गया। उन्होंने 1988 में एक सेना अधिकारी से शादी कर ली। 27 अगस्त, 1988 के एक आदेश के अनुसार, उन्हें लेफ्टिनेंट (लेफ्टिनेंट) के पद पर सेवा करते समय सेना से मुक्त कर दिया गया और बिना कोई कारण बताओ नोटिस या अवसर दिए बिना उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

 भारतीय सेना ने महिला को नौकरी से निकलने का आदेश 1977 के सेना निर्देश संख्या 61 के तहत पारित किया गया था। हालांकि, बाद में सेना निर्देश से शादी से जुड़ा नियम साल 1995 में वापस ले लिया गया था। वहीं मार्च 2016 में जॉन की रिहाई के आदेश को सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) लखनऊ द्वारा रद्द कर दिया गया था, जिसने उसे पिछले वेतन के साथ बहाल करने का निर्देश दिया था। उस वर्ष अगस्त में केंद्र ने शीर्ष अदालत में अपील को चुनौती दी।

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