पिता की हिम्मत बनीं 10 और 7 साल की बेटियां, बल्ब बनाकर करती हैं 4 लोगों का पालन-पोषण

Published : Jan 03, 2026, 01:44 PM IST
पिता की हिम्मत बनीं 10 और 7 साल की बेटियां, बल्ब बनाकर करती हैं 4 लोगों का पालन-पोषण

सार

पिता की शारीरिक अक्षमता के बाद, 10 वर्षीय गौरी और 7 वर्षीय शरण्या ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली है। ये दोनों बहनें स्कूल के बाद LED बल्ब बनाकर अपने 4 सदस्यों के परिवार का पालन-पोषण कर रही हैं।

मण्णंचेरी (केरल): मुश्किलों और कड़वे अनुभवों के बीच केरल के पोन्नाड के रहने वाले गवेश की बेटियां गौरी और शरण्या जीने का एक बड़ा सबक सिखा रही हैं। जब शारीरिक दिक्कतों की वजह से उनके पिता कमजोर पड़ गए, तो इस 10 और 7 साल की बच्चियों ने परिवार का बोझ अपने नन्हे हाथों में ले लिया। ये होनहार बच्चियां LED बल्ब बनाकर आज अपने चार लोगों के परिवार को गर्व से पाल रही हैं। जब परिवार बहुत गरीबी में चला गया, तब पांचवीं क्लास में पढ़ने वाली गौरी ने अपने पिता का काम संभालने का फैसला किया। तीसरी क्लास में पापा के साथ बैठकर शौकिया तौर पर सीखी हुई कला आज गौरी के लिए एक नौकरी बन गई है।

किस्मत की लगातार चोटें

इलेक्ट्रीशियन वी. जी. गवेश की जिंदगी में मुश्किलें अचानक आईं। दो साल पहले एक झगड़े में उनकी छाती और पेट में गंभीर चोटें आईं, जिसके बाद उनकी काम करने की क्षमता कम हो गई। सर्जरी और लगातार इलाज के कारण बन रहे घर का काम भी आधे में ही रुक गया। बाद में, जब वह मेहनत वाले काम नहीं कर पाए, तो उन्होंने बैंक से लोन लेकर किराए के घर में LED बल्ब बनाने का काम शुरू किया। कुछ अच्छे लोगों की मदद से दिल्ली से कच्चा माल मंगवाकर काम आगे बढ़ा ही रहे थे कि गवेश के साथ एक और हादसा हो गया। सीढ़ी से गिरकर उनकी हथेली में गंभीर चोट लग गई, जिससे बल्ब बनाने का काम भी ठप हो गया।

सोल्डरिंग आयरन जैसे मुश्किल काम, जिसे बड़े भी सावधानी से करते हैं, गौरी उसे आसानी से कर लेती है। इस नन्ही बच्ची को अब नंबरों के साथ-साथ सर्किट भी समझ आने लगे हैं। दीदी जो बल्ब बनाती है, उसे दूसरी क्लास में पढ़ने वाली शरण्या ठीक से पैक करके डिब्बों में रखती है। पढ़ाई के साथ-साथ खेलने-कूदने की उम्र में इन बच्चियों की समझदारी देखने वालों को हैरान कर देती है। शाम को स्कूल से आकर, अपना पाठ याद करने के बाद ही दोनों बहनें बल्ब बनाने के काम में लगती हैं।

बच्चों के बनाए बल्ब गवेश खुद पास की दुकानों में पहुंचाते हैं। घर का किराया, परिवार के रोज के खर्चे और दादी की दवा का इंतजाम ये नन्ही बच्चियां अपनी मेहनत से करती हैं। इन छोटी-सी होनहार बच्चियों का सबसे बड़ा सपना अपने आधे बने घर का काम पूरा करके पापा और दादी के साथ वहां रहना है। मुश्किलों में भी हिम्मत न हारने वाली ये बहनें आज पूरे इलाके के लिए एक मिसाल बन गई हैं।

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