मां की जान बचाने को बेटी ने 5 किमी जंगल में पीठ पर ढोया, बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की शर्मनाक तस्वीर

Published : Aug 02, 2025, 03:51 PM IST
Odisha Kandhmal health crisis

सार

Tribal Healthcare Crisis: ओडिशा के कंधमाल ज़िले के दूरस्थ गांव में सड़क न होने के कारण सांप काटने से एक महिला की जान चली गई। बेटी ने माँ को 5 किमी तक जंगल में पीठ पर ढोया, फिर भी समय पर इलाज नहीं मिल पाया।

Odisha Snakebite Death: ओडिशा के कंधमाल ज़िले (Kandhamal District) में इंसानियत और सिस्टम दोनों को झकझोर देने वाली एक घटना सामने आई है। दुर्गम दुमेरिपाड़ा गांव (Dumeripada Village) में सड़क के अभाव में एक बेटी को जीवन-मौत से जूझ रही एक मां को कंधे पर लेकर दौड़ती रही। उसकी मां को सांप ने काट लिया था। परिजन ने एंबुलेंस को कॉल किया लेकिन सड़क के अभाव में वह नहीं आया। बेटी अपनी मां को बचाने के लिए पीठ पर ढोकर 5 किलोमीटर घने जंगल से होकर अस्पताल पहुंची लेकिन फिर भी उसकी जान नहीं बच सकी।

सड़क नहीं, सिस्टम नहीं, मदद सिर्फ़ बेटी की पीठ

मृतका बलामाडू माझी (Balamadu Majhi) को शुक्रवार रात घर में सोते वक्त जहरीले सांप ने काट लिया। परिजन ने फौरन 108 एंबुलेंस सेवा को कॉल किया लेकिन खराब सड़कों और दुर्गम रास्तों की वजह से एंबुलेंस सिर्फ सरामुंडी (Saramundi) तक ही पहुंच सकी जो गांव से 8 किलोमीटर दूर है। इस विषम परिस्थिति में राजनी माझी (Rajani Majhi) ने साहस दिखाया और अपनी मां को पीठ पर बांधकर 5 किमी जंगल पार किया। फिर एक बाइक से तीन किलोमीटर और चलकर एंबुलेंस तक पहुंची। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

समय पर इलाज न मिलने से गई जान

बलामाडू को पहले तुमुडिबंध (Tumudibandh) के स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया और फिर बालिगुड़ा उपमंडल अस्पताल (Baliguda SDH) रेफर किया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। परिवार वालों का आरोप है कि अगर समय पर इलाज मिलता और सड़क होती तो जान बचाई जा सकती थी।

पहले पिता, अब मां… टूटा पूरा परिवार

राजनी के तीन छोटे भाई हैं। परिवार पहले ही पिता को इसी तरह की मेडिकल लापरवाही में खो चुका है। अब मां की मौत ने बच्चों को पूरी तरह बेसहारा कर दिया है। शव का पोस्टमॉर्टम कराने के बाद परिजनों को लाश भी खाट पर रखकर वापस घर लानी पड़ी। इस हृदयविदारक घटना ने आदिवासी समुदाय में रोष पैदा कर दिया है।

हम भी इंसान हैं, हमारी जान की कोई कीमत नहीं?

स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब चुनाव आते हैं तो नेता जंगल भी पार कर जाते हैं लेकिन जब रोज की जरूरतों की बात आती है तो ये आदिवासी क्षेत्र भगवान भरोसे छोड़ दिए जाते हैं।

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