
नई दिल्ली. नागरिकता कानून को लेकर यूरोपीय संसद में प्रस्ताव पेश किए जाने पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कड़ी आपत्ति जताते हुए ईयू विधायी निकाय के प्रमुख को पत्र लिखा है। इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि किसी विधायिका द्वारा किसी अन्य विधायिका को लेकर फैसला सुनाना अनुचित है और इस परिपाटी का निहित स्वार्थ वाले लोग दुरुपयोग कर सकते हैं।
क्या कहा बिड़ला ने?
बिड़ला ने ईयू यूरोपीय संसद के अध्यक्ष डेविड मारिया सासोली को सोमवार को पत्र लिखा, ‘‘मैं यह बात समझता हूं कि भारतीय नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 को लेकर यूरोपीय संसद में ‘ज्वाइंट मोशन फॉर रेजोल्यूशन’ पेश किया गया है। इस कानून में हमारे निकट पड़ोसी देशों में धार्मिक अत्याचार का शिकार हुए लोगों को आसानी से नागरिकता देने का प्रावधान है।’’
बिड़ला ने कहा कि इसका लक्ष्य किसी से नागरिकता छीनना नहीं है और इसे भारतीय संसद के दोनों सदनों में आवश्यक विचार-विमर्श के बाद पारित किया गया है।
उपराष्ट्रपति की भी दो टूक
सीएए के खिलाफ यूरोपीय संसद में प्रस्तावित चर्चा और मतदान की पृष्ठभूमि में उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने भी कहा कि भारत के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। इस मामले को लेकर भाजपा ने ईयू संसद के सदस्यों की निष्पक्षता पर सवाल उठाया जबकि कांग्रेस ने भगवा दल पर नागरिकता मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का आरोप लगाया। नायडू ने कहा कि वह ऐसे मामलों में विदेशी निकायों के हस्तक्षेप की प्रवृत्ति से चिंतित हैं जो पूरी तरह भारतीय संसद और सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रयास पूरी तरह अवांछनीय हैं और उम्मीद है कि भविष्य में इस तरह के बयानों से बचा जाएगा। नायडू ने कहा कि भारत के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।
भारत के साथ खड़ा हुआ फ्रांस
यूरोपीय संघ के संस्थापक सदस्य देशों में शामिल फ्रांस का मानना है कि नया नागरिकता कानून भारत का एक आतंरिक राजनीतिक विषय है। गौरतलब है इससे पहले भी कश्मीर मसले पर फ्रांस ने भारत का साथ दिया था।
क्या कहता है ईयू
751 सदस्यीय यूरोपीय संसद में करीब 600 सांसदों ने सीएए के खिलाफ छह प्रस्ताव पेश किए हैं जिनमें कहा गया है कि इस कानून का क्रियान्वयन भारतीय नागरिकता प्रणाली में खतरनाक बदलाव को प्रदर्शित करता है।
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