
नई दिल्ली। भीषण गर्मी के चलते इन दिनों देशभर में बिजली की मांग बढ़ी हुई है। दूसरी ओर कोयले की कमी के चलते देश के करीब एक चौथाई पावर प्लांट बंद हैं। मांग में वृद्धि और बिजली उत्पादन में कमी के चलते देशभर में बिजली संकट (Power Crisis) है। भारत के कई हिस्से लंबे समय तक ब्लैकआउट का सामना कर रहे हैं, जबकि कुछ उद्योग कोयले की कमी के कारण उत्पादन में कटौती कर रहे हैं।
इस बीच पावर प्लांट तक कोयला तेजी से पहुंचाने के लिए रेलवे ने बड़ा फैसला किया है। कई पैसेंजर ट्रेनों को रद्द किया गया है ताकि कोयला लदी मालगाड़ियों को तेजी से चलाया जा सके। चिलचिलाती गर्मी के चलते कोयले की मांग बढ़ गई है। देश की बिजली का लगभग 70% उत्पादन कोयले से होता है। इस महीने की शुरुआत से भारत के बिजली संयंत्रों में कोयले के भंडार में लगभग 17% की गिरावट आई है। यह आवश्यक स्तरों का मुश्किल से एक तिहाई है।
अस्थायी उपाय है पैसेंजर ट्रेनें रद्द करना
एशिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक भारतीय रेलवे के कार्यकारी निदेशक गौरव कृष्ण बंसल ने कहा कि पैसेंजर ट्रेनें रद्द करने का उपाय अस्थायी है और स्थिति सामान्य होते ही यात्री सेवाएं बहाल कर दी जाएंगी। उन्होंने कहा कि रेलवे कोयले को बिजली संयंत्रों में ले जाने में लगने वाले समय को कम करने की कोशिश कर रहा है।
16 मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों का परिचालन रद्द
रेलवे ने करीब 16 मेल/एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनों का परिचालन रद्द किया है। रेल मंत्रालय के अनुसार 24 मई तक पैसेंजर ट्रेनों के करीब 670 ट्रिप्स रद्द किए गए हैं। इनमें से 500 से अधिक ट्रिप्स लंबी दूरी के मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों के हैं। रेलवे ने रोज लोड होने वाले कोयला रैक्स की संख्या भी बढ़ा दी है। यह 400 से अधिक हो गया है। पिछले पांच साल में यह सबसे अधिक है।
सूत्रों के अनुसार बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए रेलवे रोज 415 रेल रैक्स उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है। इनमें से हर एक मालगाड़ी करीब 3500 टन कोयला ढो रही है। रेलवे कम से कम दो माह तक अधिक कोयला ढोने का अभियान चलाएगी ताकि पावर प्लांट्स के पास कोयला का पर्याप्त स्टॉक जमा हो सके। जुलाई-अगस्त में बारिश के चलते कोयले की खुदाई प्रभावित होती है। इसके चलते पावर प्लांट्स को कोयला स्टॉक कर रखना होता है।
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बता दें कि भारतीय रेलवे को अक्सर कोयले की आपूर्ति में व्यवधान के लिए दोषी ठहराया जाता है। मालगाड़ियों की कमी के कारण कोयले को लंबी दूरी तक ले जाना मुश्किल हो जाता है। भीड़भाड़ वाले रेल रूट पर मालगाड़ियों को गुजरने में अधिक देर होती है। इन्हें पैसेंजर ट्रेन को रास्ता देने के लिए रुकना पड़ता है। इसके चलते खदान से पावर प्लांट तक कोयला पहुंचने में देरी होती है।
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इसके बाद भी सस्ता होने के चलते मालगाड़ियों द्वारा कोयले को ढोना पसंदीदा विकल्प बना हुआ है। बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए रेलवे की अपने बेड़े में एक लाख और वैगन जोड़ने की योजना है। इसके साथ ही रेलवे सामान को तेजी से पहुंचाने के लिए समर्पित फ्रेट कॉरिडोर भी बना रहा है।
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